अंजुमन के गुंचा ए ग़ुल,

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अंजुमन के गुंचा ए ग़ुल,
अंजुमन के गुंचा ए ग़ुल,

अंजुमन के गुंचा ए ग़ुल,

अंजुमन के गुंचा ए ग़ुल से रंग ओ बू नदारद है , अब हर एक कूचे से सियासत की बदबू सी आती है ।

एक ग़ज़ब की तिस्नगी थी मौसम ए नज़ाक़त की जुस्तजू में , सर्द सेहरओं से दिल अकेला ख़ार होके गुज़रा ।

शबाब ए हुश्न हो ज़रूरी तो नहीं , ज़िक़्र होता है तेरा आज भी बादाकशों में मयकशी के बाद ।

बादाकशों  ने मोहब्बत का नाम ही बदल डाला , गोया बिन पिये उनसे इश्क़ आज भी बहुत करते हैं ।

जुम्मा जुम्मा चार दिन की मेहनत ,और तक़दीर कोसने को उम्र भर का जुमला भी क्या खूब होता है ।

ज़मीन वालों को दीदार ए यार की चाहत , हर रोज़ ईद कहाँ होती है हर रात चाँद कहाँ दिखता है ।

गुलपोश नगीने सा सम्हाले रखा था सीने में,हुआ जो बेनक़ाब तेरा चेहरा तो दिल ए नादाँ रक़्स करने लगा ।

तसव्वुर में कटी रात तेरी यादों के पलछिन, चाँदनी से भई बात चाँद तारों को गिन गिन ।

भला मानस समझ कर जिसने देहलीज़ लाँघा था , फ़क़ीरों के वेश में वो सैय्याद निकला ।

सबको जिस्म की ज़रुरत थी , वो रूहों की बोली लगा रहा था ।

बिक रहे थे जिस्म मेरे शहर में बेलिबास बहुत सस्ते , कुछ खस्ता हाल थे कुछ थे ख़ानदानी बड़े अच्छे ।

ज़ौक़ ए सुखन भी रंग लाता है . शाम ए बज़्म में साज़ और आवाज़ रोज़ परवाज़ भरते हैं ।

बिक रहे हैं कौड़ियों के मोल में लोगों के ईमान यहाँ , मैं उसी बाजार में ख़ाली लिबास ढूंढ़ता रहा ।

कितनी बेख़ौफ़ आफ़तें रोज़ सर से होकर के गुज़रती हैं , कभी बेबाक मोहब्बत भी करके देखो ।

तुझसे जुड़ा हर मुद्दा कल तक मेरा था , आज मेरे अपनों के चेहरे भी सारे तेरे हैं ।

दाग़ दामन के परवाह यहाँ कौन करे , दग़ाबाज़ी शहर ए आदम की जब रग रग में ठहरी सी मिले ।

मुर्दों को साझेदारी नहीं मिलती , लोग ज़िंदा लोगों से मुँह फेर लेते हैं ।

सारा दिन सूरज की चाहत से आँच मिलती रही , फिर क्यों हर फूल बिखर जाता है शाम की ठण्ड के बाद ।