आज़मा न ज़ोर,

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आज़मा न ज़ोर,
आज़मा न ज़ोर,

आज़मा न ज़ोर,

आज़मा न ज़ोर मेरे बाजू का , क़लम का तोल है तराज़ू का ।

हलक़ से उतरे जो मोहब्बत पैमाने में ज़ाया करता , मैं तेरे दर पर अपना ख़ाक ए बदन धूल मिटटी में उड़ाया करता

दिल से कागज़ में उतर आते हैं , वो लम्हे जो भुलाए नहीं जाते ।

चंद टुकड़े ही वसीयत के बड़े अच्छे हैं , बाप दादाओं की मिल्कियत है खाकसारों में उड़ाई नहीं जाती ।

बेज़ुबानी में दिलों के हालात बयान होते हैं , ज़ख्म दिल में हों तो राग ओ रंग साथ खुद ही साज़ बज उठते हैं ।

खुले ज़ख्मों के तमासाई बहुत हैं, मरहम लगाने वाला कोई सैदाई नहीं मिलता ।

है ख़ामोश तन्हा ज़िन्दगी , मैं सुनसान रास्तों में अकेला गुमसुम खानाबदोश

ज़ख्म पर ज़ख्म है फ़ितरत उसकी , ये मेरा दिल इश्क़ बड़ा बेहिसाब करता है

हर बात में तंज़ हो ज़रूरी तो नहीं. फिर मोहब्बत में और बात हो ज़रूरी तो नहीं ।

कभी रुख़ पर पर्दा कभी चेहरा बेनक़ाब . ये हुश्न ए ज़माल है परदनशीनो का है कमाल

जिसे तेरी सूरत से इतनी नफ़रत है , कभी सोचा है मोहब्बत वो तुझसे कितनी करता है ।

हमने तो मोहब्बत क़ामिल की थी , कम्बख़्त वो ही जराफत के क़ाबिल निकला ।

पलट कर देखता है मेरे नाम पर तू अब भी बार बार , क्या मेरे जनाज़े का तुझे इत्ता सा भी ऐतबार नहीं ।

किसी ने साँझ पढ़ी किसी ने शाम ए बज़्म पढ़ा , मेरी क़लम ने हर क़लाम में मेरे हाल ए दिल का पयाम लिखा ।

तू तो बर्बाद नज़र आता है मेरी सारी मिल्कीयत लूट कर के भी, हमने तो दौलतें खड़ी कर ली तेरे दिए ज़ख्म बेंचकर ।

ज़बान ग़र सूख भी जाये तो कोई बात नहीं . क़लम की स्याही दिल के गीले जज़्बात बयान करती है ।

पलट के रख सकती है सख्सियत सबकी , हम बदगुमानी में क़लम का वक़्त ज़ाया नहीं करते ।

बेंचने वाले बेंच देते होंगे चंद सिक्कों में मिल्कीयत अपनी , हम अपनी क़लम की ताक़त का सही सौदा करेंगे ।