ऊँघती अलसाई शाम गर्मी की थकन से चूर,

1
200
ऊँघती अलसाई शाम गर्मी की थकन से चूर,
ऊँघती अलसाई शाम गर्मी की थकन से चूर,

ऊँघती अलसाई शाम गर्मी की थकन से चूर,

ऊँघती अलसाई शाम गर्मी की थकन से चूर , सुदूर कहीं शहर के बंतड से परे धानी चूनर ओढ़े थक के सो गयी ।

कुछ किस्से कहानियां बुनते , कुछ दादा दादी के साथ चाँद तारे गिनते , घर के आँगन में बिछे खाट पर , गर्मियों की रात गुज़र जाती थी ।

सड़क पर गिट्टियां फोड़ना ही है क्या ज़िन्दगी का मक़सद , पेट की आग की खातिर ही जिस्म गर्मी की धूप में तिपा करता है ।

जितने थे फूल मेरे हिस्से के , लू के थपेड़ों में कुम्हला के कहीं सो से गए ।

जली जली सी धुप में जले जले से ख़्वाब लेकर , हर शख़्स निकल जाता है झुरमुट की तलास में ।

एक एक नज़्में सजाने में उम्रे गुज़ारी थी हमने , वो उन्ही नज़्मों के दरमियाँ पुरज़ोर चले

मुर्दों की शहर में तादाद ज़्यादा है , बादाकशों से कह दो कहीं और ज़ाम लहराएँ ।

जो समझते हैं ज़मीनी ज़र्रों पर बारिसाना हक़ , ज़मीन से आस्मां तक हर औक़ात अपनी है ।

ग़र कोई है मुझसे भी ज़्यादा पाक़ीज़ा , तो मेरे कफन से ज़्यादा सुफेद होकर दिखलाये ।

न कोई साँस न आहट न रूहों की बख़त, शहर के शहर बस बुतों के मकबरे से लगते हैं ।

कोई ऐसा भी मज़हब हो , जिसमे इंसानियत के वास्ते संस भर की भी राहत हो ।

मेरे मरने के बाद मेरे जनाज़े का शामियाना तगड़ा था , जीते जी हाल पूछ लेते तो क्या बिगड़ा था ।

मत पूछ चरागों का सफ़र कितना था , सारी रात तन्हा जले और सेहर होने से पहले ही बुझ भी गए ।

ख़ामोशी से ख़्वाहिशों की सुपुर्दगी करके , वो चला गया धड़कते दिल को तन्हा करके ।

एक चैन की नींद आये तो सुकून आये , बस एक लम्हे में तमाम उम्र बसर हो जाए ।

दिल ए फ़ित्ना की तबीयत नासाज़ समझ कर , वो कड़ी धुप में निकला है तगादा किये बग़ैर ।

बढ़ा के थामा था हाँथ अगर उम्र भर साथ तो चलता , क़फ़स बदला था जनाज़े के साथ में रहता