कभी एक मुख़्तसर सी नज़र,

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कभी एक मुख़्तसर सी नज़र,
कभी एक मुख़्तसर सी नज़र,

कभी एक मुख़्तसर सी नज़र,

कभी एक मुख़्तसर सी नज़र सीधा दिल पे असर करती थी ,

गोया अब तो बस उम्रें नज़र होती हैं तेरे जाने के बाद ।

दिल के हालात बड़े ज़ख़्मी हैं रश्म ए मोहब्बत के बाद ,

कभी महफ़िल नहीं मिलती तो कभी राज़ ए दिल नहीं मिलता ।

सुख़नवर तो बहुत मिलते हैं राह ए उल्फत में ,

मगर तन्हाई ए हिज्र में दिल के इर्द गिर्द कोई बाब ए सुखन नहीं होता।

बदस्तूर रवायत ए माहौल बनाया जायेगा ,

मोहब्बत के शोलों को चिलमन में शबनम से बुझाया जायेगा ।

लहरें जो मचल जाती थी चाँदनी को देख कर ,

न अब वो बहर ए बहार न वो चाँद रात है ।

ज़िद थी रवायतों की ,

 

शाम होते ही समंदर में जुगनू ,

बेपरवाह निकल जाते हैं लहरों की सरगम सुनने ।

सात समन्दर पार निकल जाने की ज़िद ,

शाम से ही सफ़ीने के साथ लहरों पर चाँद उतर आया है ।

समन्दर की लहरों पे सजधज के चाँद तारों की बरात चली ,

शब् ए महताब मेरे मेहबूब ए इलाही का इरादा क्या है ।

फलक पे चाँद सितारों की सेज़ सजी भी नहीं ,

दिन का सूरज रोशनी का जश्न मनाकर समन्दर में डूब गया

समन्दर की पड़ी रेत जल के बुझ भी गयी ,

वो लहरों की मौजों में मदहोश बना फिरता रहा ।

 

ग़म ए रूख़्सती मिली ,

 

मैं समन्दर हूँ मुझको आरसी न दिखा ,

जाने कितने आफ़ताब रोज़ बुझाता हूँ मैं ।

बूढ़े माँ बाप थे साथ में रहगुज़र कर लेते ,

जाने कैसी औलाद थी घर के टुकड़े करके निकल गयी ।

रात का जश्न चलेगा चलने दो ,

दिल को टुकड़ों में आज जलने दो ।

ज़मीन पर समन्दर जला जला सा है ,

फ़लक़ पर चाँद बुझ गया होगा ।

रियासतें होगी सियासतें होगी ,

अवाम के आँसुओं की अपनी अपनी किस्से कहानियाँ होगी ।

 

दीदा ए यार से,

 

ये मेरे अश्क़ तेरी आँखों में ज़ख्म कर देगे ,

इन नज़रों में आँसू नहीं दीदा ए यार के रंज ओ ग़म बहते हैं ।