कमबख्त निगाहों की,

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कमबख्त निगाहों की,
कमबख्त निगाहों की,

कमबख्त निगाहों की,

कमबख्त निगाहों की इज़हार ए गुफ़्तगू थी या बस , बिना इंकार किये उँगलियों में दुपट्टा घुमाते निकल गए ।

जुज़बी ही निगाहों में इज़हार हुए , रात चाँद तारों में कटीख़्वाबों के तलबगार हुए ।

खनकते पैमानों ने छेड़ दी सरगम , जाम गर आज छलक जाए तो ग़ज़ल हो जाए ।

इश्क़ की बेतुकी बातों से ज़्यादा हम , मर के भी हमदम का ख़्याल रखते हैं ।

कुछ इन नज़रों की भी जलवा फरोशी हो जाये , अपनी आँखों के नूर तो हर रोज़ बने फिरते हो ।

शान ए महफ़िल तेरी दोस्ती के सदके , आज फिर शाम ढले तेरा ख़्याल आया है ।

शाकिया ए गुल मैं और मैखाना , फ़िज़ा की खुशबुओं से दोस्त बनते गए ।

जल उठी शमाएं महफिलें रोशन हुईं , लो फिर मोहब्बतों के दम से शाम ए बज़्म का आगाज़ है ।

मेरे पुराने पल ही मेरे अपने न थे , वक़्त का सरमाया क्या मेरा ख़ाक होता ।

मेरे सफ़ीने साहिल से पहले डूब गए , बर्बाद ए मोहब्बत की तबाही के लिए लोगों की बद्दुआओं की ज़रुरत नहीं होती ।

वो नज़रों की जुम्बिश वो रुखसार के बदलते तेवर , सरगोशियाँ कहती हैं मोहब्बत है तो बस है ।

वर्जिश ओ मसक्कत से पूरे कर लेंगे , ये खामियाज़ा ए मोहब्बत बस खाने पीने से नहीं भरने वाले ।

बुनियादी ज़रूरतों में पत्थर की ईमारतें भी शामिल हैं , बस इंसान में इंसानियत का कभी ज़िक्र नहीं होता ।

अज़ीब कश्मकश है शामियाने में , चाँदनी रात में फिर चाँद बुझा बुझा क्यों है ।

बनते हैं इमारतों से शहर , शहर में सुकून बसता है , फिर भी हर शक़्स चैन से कहाँ सोता है ।

मैं मेरे शहर में गर खामोश रहता , मैं मेरा घर फूकने का खुद बंदोबस्त करता ।

छलकते पैमानों से टपकती शबनम , तू भी दो घूँट पी शाकी तो ग़ज़ल हो जाये ।

मेरा नशेमन गवाही देने लगा , मोहब्बत के बिना कोई शहर शहर ही नहीं