कोख में ही न बेईमानी होती अगर,

0
164
कोख में ही न बेईमानी होती अगर,
कोख में ही न बेईमानी होती अगर,

कोख में ही न बेईमानी होती अगर,

कोख में ही न बेईमानी होती अगर , और बच्चों के साथ माँ बाप की लाडली भी खेलती घर घर

शहर ए मुजस्सिम में इंसान की कोई बख़त नहीं प्यारे , थक गए जो ईमान बेंचते बेंचते ईमानदारी का तमगा लगाए फिरते हैं ।

जिस्म बेचने में मजबूरी रही होगी उसकी , तू क्या भूखो मर रहा था जो अपना इमान बेंचकर आया ।

बड़े सस्ते में बिक जाता है ईमान, वकील की कोट सा हर शाम घर खूँटी में टंग जाता है ईमान ।

मुजस्सिम ए ईमान को बुतख़ानों में सजा दो ऐसे , दादा परदादा की तस्वीर पर लटकती तस्बीह ए मुर्दा हो जैसे ।

अब तो ईमानदारी के नाम से भी डर लगता है , कहीं लोग नेता न समझ लें मुझको

यूँ सरे राह निकल आते हैं वो इस नज़ाक़त से , पर्दानशीनों के भी ईमान डोल जाते हैं ।

न समझ में आये तो नादानी सही , ईद का चाँद सबका है मेहबूब बस एक का ही नहीं

आग लगती है तन्हाई में , रोज़ हर रात जाने कैसे बरस जाती है ।

आदम ए सूरत को तवज्जो देते थे नहीं , अब अक्सर चाँद तारों की बात किया करते हैं ।

इतनी नफ़रत से न देखो कि दिल रुआंसा है , दर्द ए दिल हलक तक भरा भरा सा है ।

ईंट गारे से ओहदे का पता चलता है , मलबे के ढेर ने ईमारत कि औक़ात बता दी हो जैसे

कौन रोता है किसके मरने पर , कुछ ज़रूरतें कुछ दिखावा रुला देता है ज़माने को ।

मुर्दों से किरदार निकल आते हैं , जनाज़ा किसी का बेरोज़गार नहीं होता

कुछ हकीकत है कुछ फशाना है , ज़िन्दगी ख़ुशी और गम का बस तराना है

एक छोटी सी बस्ती का नाम जहान करके , वो चला गया जहान को अलविदा कहके ।

ज़रूरतें बदल देती हैं इंसानी फितरतें , मरने के बाद मुर्दे के पास कौन जाता है ।

डर न जाए आदम ए सूरत से ही इब्लीस , गोया मैय्यतों में भी लोग सज संवर के जाते हैं ।