ख़ाक चिलमन भी बुझा आया हूँ,

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ख़ाक चिलमन भी बुझा आया हूँ,
ख़ाक चिलमन भी बुझा आया हूँ,

ख़ाक चिलमन भी बुझा आया हूँ,

ख़ाक चिलमन भी बुझा आया हूँ, मैं तेरे कूचे से अरमान उठा लाया हूँ ।

चलती बयार उड़ती हिना की ख़ुश्बू , किसी गजरे से गिरा कोई उरूज़ ए गुल होके फ़नाह ।

बहुत मुमक़िन है शहर भर में लोग जीने न दें , और सामने बिखरा पड़ा हो कारवाँ तेरा ।

जली जली सी बस्तियाँ बुझे बुझे से चराग, क्या कोई दिल अभी भी यहाँ सुलगा है ।

रात भर सिसकी कली यौवन की, रात भर महका बदन राज़ ए ग़ुल और हिना सन्दल से ।

महक पिस कर के कहीं जाती नहीं , साथ मिल कर के साद ए गुल और महक जाता है ।

मुस्कुराना ही है हिना की फ़ितरत, गोया पिस के पत्थर में कहीं और निखर जाता है ।

जितना मुट्ठी में है वक़्त मेरा है , जितना हाँथों से फिसला ख़ाक होता गया ।

चरागों पर पर्दा करके , आज रंग ओ बू ए हिना का हुनर दमकेगा ।

कैसे कटी है रात ग़म ए फ़ुरक़त वाली, नीले नीले अम्बर के गीले गीले चाँद तारे गवाह हैं ।

हौंसले हमारे हमेशा से थे उरूज़ पर , देखा मुक़ाम ए हाल गोया इश्क़ का ज़ायक़ा बदल गया ।

हिज़्र की तन्हाइयों में नींद कैसे आती है , आँख मूँद कर लेटना तो बस बहाना है ।

शराफ़त से गुज़र रहा था जनाज़ा शरीफ़ का , गुज़रा हुज़ूम ए आदम से कपडा उँघर गया

जिश्मों की नुमाइश में फीताकशी बवाल है , मर्दों की भीड़ में यहाँ मर्दों का जीना मुहाल है ।

जनाज़ा मोहब्बत के मारों का यूँ निकला साहेब, जनाने को हाल ए दिल दिखाने से पहले कुछ मर्दाने भी पीछे पड़ गए ।

बनाने वाले ने फुर्सत में तराशा होगा तुझे , तेरे नैन ओ नक़्श की नज़र तस्वीरें बेज़ान लगती हैं ।

मेरे आक़ा ने मेरी मौत का सामान इस क़दर तैयार किया , ख़्वाब दिखाए हूरों के बदले में तस्वीरें थमा दीं

ये लबों की तिश्नगी क्या समझेगी तस्वीर तुम्हारी , ये क्या साथ साथ मेरे कभी साँस लेती है ।