खिज़ा के मौसम में बढ़ के बहारें दामन चूम लेती हैं ,

1
203
खिज़ा के मौसम में बढ़ के बहारें दामन चूम लेती हैं ,
खिज़ा के मौसम में बढ़ के बहारें दामन चूम लेती हैं ,

खिज़ा के मौसम में बढ़ के बहारें दामन चूम लेती हैं ,

खिज़ा के मौसम में बढ़ के बहारें दामन चूम लेती हैं , बोसा ए इश्क़ के बाद कुछ कलियाँ नाम पूछ लेती हैं ।

एक ताज़ा तरीन नज़्म है दिल में आपकी शिरकत के बाद , बेखुद है चश्म ए चोंट से न हरकतें न धड़कन न कोई जवाब ।

मोहब्बतों के कसीदे पढ़ने में उम्र ए ज़ाया करके , आओ तह ए दिल से जज़्बा ए इश्क़ के दो दो हाँथ कर लें ।

एक मोहब्बत का इल्म है जो खींच लाता है दिलों को आदम के पास , एक हसरत ए बहसत है जो इंसान को इंसान तक आने नहीं देती ।

रुक्क़ाह थमा गए रोज़मर्रा की ज़रूरीतो वाले . गोया ये भी न सोचा दिल का रिश्ता है परचून की दूकान तो नहीं ।

सुना है जम्हूरियत ए ईमान में चरचनाएँ बहुत होती हैं , बस दास्तान ए इश्क़ को कोई ख़ुतबा नहीं मिलता ।

चलो दिल में छुपे दरियाओं को पी जाएँ , ये आंसू आँखों को खार बनके चुभते हैं ।

हर बात बताई जाये ज़रूरी तो नहीं , कुछ रिश्ते बस ऐतबार पर चलते हैं ।

वैचारिक वैमनश्यता के चलते , सौहार्दपूर्ण ढंग से सहिष्णुता के साथ अतिथियों को गिद्ध भोज में सम्मिलित किया जाए ।

कितना मांजेगा मुझे माँझे से , सद्धी तेज़ है मेरी तेरे मज़हबी इल्म के धागे से ।

तुमको तुम्हारे मज़हबी इल्म ने तबाह किया , हमने तो बस इश्क़ में बुत ए मुजस्सिम को ज़िन्दगी अदा करी ।

बड़ी ज़हमत के बाद आती है ज़बान पर रह रह के , वो दास्ताने लैला मजनू ये दौर ए वहशत का इल्म और ज्ञान

लाख इल्म सही आज के आदम ए दौर में , लेकिन वो तहज़ीबतलफ़्फ़ुज़ वो अंदाज़ ए अदायगी नहीं दौर ए जहां में ।

दो निवाले की ललक में मिट रही हो बेटियाँ , कौन चैराहे में टंगवाये जहां आबाद है अपना ।

यहाँ बस मज़हबी इल्मी हैं सारे जमात में , सबसे ऊपर क़ुदरत ने सिर्फ एक इंसानियत ए इल्म बक्शा है सारे जहां में ।

धारा सारी गिना गया रिहाइयों वाली , एक भी दफ़ा बता देता बेमुरव्वत में फंसे दिल की इश्क़ ए गिरफ़्तारी वाली ।