घरों को रौशनी के वास्ते ही चरागों से जलाये रखता ,

0
137
घरों को रौशनी के वास्ते ही चरागों से जलाये रखता ,
घरों को रौशनी के वास्ते ही चरागों से जलाये रखता ,

घरों को रौशनी के वास्ते ही चरागों से जलाये रखता ,

घरों को रौशनी के वास्ते ही चरागों से जलाये रखता ,

इश्क़ का भरम टूटा नहीं था कम्बख्त भरम तो बनाये रखता l

 

बाद ए इश्क़ के भी अदावतें ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही हैं ,

यादें तेरी मुसलसल दिल पर मेरे नश्तर चुभा रही हैं l

 

हम जिनकी चाहत में बर्बाद हुए हैं ग़ालिब ,

वो हमारी मैय्यत में आके पूछते हैं ज़ौक़ ए मोहब्बत के अलावा माज़रा क्या हैl

 

खुद की जदो में जड़ें तलाश करता है ,

लुटा लुटा सा शहर इब्न ए इंसान को लूटने की हदें पार करता है l

 

नज़रे तरास लेती हैं चेहरा तेरा ,

ख़्वाबों की पलछिन वो साया अजनबी नहीं होता l

 

ख़ुलूस ए इश्क़ दिल में ही दबाये रखा ,

ज़िन्दगी की उम्रें रिश्तों में ज़ाया कर दी l

 

इतने ज़ख्म थे लफ़्ज़ों में न उतरते ,

गोया नासूर बनके ताउम्र जिगर में कसकते l

 

गुंचा ए गुल में डूबे न बाग़ ए बहार में ,

कोई तो हो जो बाब ए सुखन की विरासत सम्हाल ले l

 

तमाम उम्र की जद्दोज़हद थी ज़िन्दगी ,

कोई खुद रोया कोई अपने पीछे रोने वाले छोड़ जाता है ।

 

हर एक के हक़ के निवाले सियासी गुर्गे गटक गए ,

फ़क़ीर बोलता रहा बन्दे तेरी किस्मत खराब है ।

http://www.pushpendradwivedi.com/%e0%a4%a4%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9f%e0%a5%82%e0%a4%9f%e0%a5%87-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%88/

 

न खुशनुमा से मंज़र न बाग़ ए बहार हो ,

बस एक अरमान है गुलों का ज़मीन ओ आस्मां के आगे रंग ओ बू की दास्तान हो ।

 

रात की गिरह में दफ़न हैं कितने ,

दर्द के नग्मे और जिगर के छाले ।

 

बहिस्त की हूरों को रख ख़ुदा के वास्ते ,

दो वक़्त की रोटी ही बहुत है इब्न ए इंसान के वास्ते ।

 

जानवर में गर वेह्शत है बस पेट के वास्ते ,

गोया इंसान क्यों निकल पड़ा दहशत के रास्ते ।

 

फिरता है कोई कोई दर दर कोई लुक्मा उड़ा रहा ,

बस पेट की हवस है इंसान इंसान के हक़ को खा रहा ।

 

बग़ावत है किसी में किसी में पेट का जुनून ,

हर शख्स है मज़बूर सा इस पेट के दरूं ।

pix taken by google