जश्न ए ग़ालिब,

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जश्न ए ग़ालिब,
जश्न ए ग़ालिब,

जश्न ए ग़ालिब,

जश्न ए ग़ालिब की ग़ज़ल सी कहीं तासीर नहीं , बिना ग़ालिब के मुकम्मल हो कोई तस्वीर नहीं ।

फ़लक़ पर जश्न ए ग़ालिब की ग़ज़ल क्या लिख गयी, शब ए बज़्म में चरागों को रोशन करने कई फ़नकार आ गये ।

लहू के रंग ओ बू से हर इंसान एक जैसा था , फिर भरे बाज़ार में बिकते रिश्तों का नुस्खा क्या था ।

राह ए उल्फ़त में मंज़िल का तलबग़ार है कौन , हाँथ में हाँथ रख दो चार क़दम साथ तो चल ।

तंग हाल हैं रूहें जिश्म ए मुजस्सिम के दायरे में रहकर , वजूद ए सुकून की खातिर ही बस ख़ाक ए सुपुर्दगी मिलनी चाहिए ।

इतना गहरा है कोई ज़ख्म जो इश्क़ से ज़्यादा नासूर लगे, रूहानी मुलाक़ात के बाद ही दिलों को सुकून मिले ।

मुलाक़ात ऐसी हों रूहें मिलने की , दरमियां ज़ीस्त के न कोई जिस्म न कोई पर्दा हो ।

मुझको मेरे दींन ओ मज़हब से सरोकार नहीं, तू मुझको ज़माने भर के रिश्तों की दुहाई ना दे ।

दिल किसी और से मिलने का तलबग़ार नहीं , रूबरू मेरे मेरा आइना ए अक़्स बदल जाता है माज़रा क्या है ।

खुद के दरूं तमाम रात की गुफ्तगू के बाद , ये फैसला निकल के आया कोई शख्स दिन के उजालों में मेरे जैसा भी है

जहान भर का उजाला अतीत लगता है । दिल के खामोश अँधेरे को उजालों की तलाश हो जैसे ।

ये उर्दू अदब है हर ज़बान पर मोहब्बत की बात होती है, शाम ए बज़्म के शामियाने में शान ए ग़ालिब की बात होती है ।

तुझको हर रोज़ मोहब्बत हो मयकशी में ही सही, तू हर रोज़ शेर कहे ग़ालिब की नज़र ही होगी

करके इरशाद मोहब्बत पर एक शेर कहा , तर्क़ ओ ताल्लुक़ ना इत्तेफ़ाक़ग़ालिब की ग़ज़ल हो ऐसी सौगात कहाँ ।

जो लोग लिखते हैं सुखनवर अच्छे , हो ना हो उन पर ग़ालिब की ख़ास ए मेहर ही होगी ।

सारा जहान रोशन है तेरे बदन की रोशनी के साथ , अब मुझे किसी और चश्म ए चरागों की दरकार नहीं ।

सर्द झोंके ज़ख्म में चुभते हैं , मेरे ख़्वाबों को यूँ बेलिबास ना कर ।

ग़ालिब का तसव्वुर है या शायर की तू ग़ज़ल , तू ताज़ ए मुजस्सिम है या झील का कँवल ।