ज़िद उनकी दिलों से खेलेंगे ,

1
112
ज़िद उनकी दिलों से खेलेंगे ,
ज़िद उनकी दिलों से खेलेंगे ,

ज़िद उनकी दिलों से खेलेंगे ,

ज़िद उनकी दिलों से खेलेंगे ,

गोया हम भी तन्हा अंधेरों में सोते नहीं है फ़राज़

वो हमारा इश्क़ सरहदों में बाँट रखे हैं फ़राज़ ,

गोया एक हम है जो दिल देते वक़्त दोस्त दुश्मन देखा नहीं करते  ।

दर ओ दीवार भी सिसकती हैं ,

सरहद पर गया फ़ौजी जब तक घर लौटता नहीं ।

सरहद पार से लोरियाँ सुनाने का रिवाज़ ,

रात भर सोये नहीं लगता है साथी बुरा मान गया ।

वो कहते हैं जंग करो फ़राज़ ,

गोया यहां भी अपना वहाँ भी अपना ही कोई खून बहेगा ।

 

 

बेवफ़ा तुम हो क़बूल करो ,

रात तो हर शाम के बाद सेहर होने तक मुक़म्मल है फ़राज़ ।

उन फ़ानूसों में भी रूह बसती है फ़राज़ ,

जो फ़लक़ पर कभी चश्म ए तामील हुआ करते थे ।

दर्द कौन जाने जलते चरागों का ,

कभी घर में कभी मज़ारों में तन्हा छोड़ आते हैं ।

हर एक की तारीख़ मुक़र्रर है ज़माने में ,

जाने किस ख़ौफ़ में मुर्दा बदन को धोते हैं ।

हम दिन भर घरों में ताला लगाए फिरते रहे ,

शाम को दिल हर रोज़ लुटा लुटा क्यों है ।

 

 

सड़क के उस ओर बैठी बुढ़िया सोच रही है ,

सरहद पर बड़ा सन्नाटा पसरा है ,

जंग ख़त्म हो गयी शायद अब उसका मुन्ना घर को लौट आएगा ।

मैं अपनी तन्हा रातों सा मुफ़लिश ,

मेरे मुन्तज़िर खड़े दो नैना तेरे बाब तकते हैं ।

कभी तुम भी ज़ुल्फ़ें फहराया करो ,

हर रात काली नागिन सी भेज देती हो नज़रों पे लहराने ।

तुम किताबों में चले आया करो ,

हम नग़मे ही गुनगुना लेंगे।

सूखी चादरों में लिपटे आँसू ,

रात गए जाने कैसे भीग गए ।

 

http://www.pushpendradwivedi.com/%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%b2-%e0%a4%8f-%e0%a4%ab%e0%a4%bc%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a4%be-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%85%e0%a4%a8%e0%a4%be/

 

रात का मख़मली एहसास सा सुखन ,

सुबह होते ही हर्फ़ दर हर्फ़ लफ़्ज़ों में फूट गया ।

शाद ए दिल की रंगीनियों का मिजाज़ ,

कुफ्र और हिज्र से नाशाद नहीं ।

ज़िन्दगी मख़मली नहीं खार सही ,

फिर क्यों न तह ए दिल से शाद ए तान कोई छेड़ा जाए ।

pix taken by google