तक़ाज़ा ए उम्र,

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तक़ाज़ा ए उम्र,
तक़ाज़ा ए उम्र,

तक़ाज़ा ए उम्र,

तक़ाज़ा ए उम्र ये कहता है , सेहर होने तक ये रात ये तिश्नगी ये उम्मीद ए चराग कभी बुझते नहीं ।

बड़ी बेहयाई से उठती लहरों का जूनून देखो , दिल में कितनी उम्मीदें जगा कर साहिल से मिलती हैं ।

वक़्त की फ़ितरत बदल गयी साहेब , इश्क़ के बाद इबादत ए ख़ुदा हम नहीं करते ।

उनके लफ़्ज़ों से ख़ुदा की नमाज़ें अदा होती हैं . जो हर्फ़ दर हर्फ़ मोहब्बतों की मोतियाँ पिरोते हैं ।

भूरी चमकती आँखों में तज़ुर्बा है , ये एक उम्र का तक़ाज़ा है ।

बूढ़े दरख़्त की लुग्दी से अब अख़बार बनता है , जिसकी छाँव तले बुज़ुर्गियत की चौपाल सजती थी ।

रूख़्सती का वक़्त है प्यारे , यही इल्तेज़ा है गुंचा ए गुल की उछलो कूदो आबाद रहो  ।

क़हक़शाँ गूँजते थे जिन दरीचों में , फ़लक़ पर कारवाँ लेकर सुनहरी शाम बैठी है ।

इत्मीनान से सोया पड़ा है सन्नाटा फ्लाईओवर ब्रिज के नीचे, कभी ये चौराहा शहर भर के बुज़ुर्गों की शान होता था ।

ख़्याल आया तो एक बुज़ुर्ग की नसीहत याद आई , सहेज लो दुआएं नसीब वालों को बुज़ुर्गों का लाड़ मिलता है ।

मैं इश्क़ करता हूँ , हर्फ़ दर हर्फ़ कागज़ ए बयानी क़लम सयानी करती है ।

मुट्ठी से फिसली रेत् सा दरिया में बहता जाता हूँ , मैं बिसरे वक़्त की तहरीर सा गुमनाम हुआ जाता हूँ ।

अब एक ही काम बचा है शहर के बेरोज़गारों में , ख़त मेहबूब के छुपा के अख़बारों में सुबह से शाम पढ़ते रहना

दो वक़्त की रोटी पाँच वक़्त की नमाज़ , क्या इतना कम है या मौला ।

चश्म ए चरागों में हो गर उम्मीद की लौ , जलते अंगारों में भी फूल खिला करते हैं ।

तुझ पर शबाब आया आकर चला भी गया , यहां खिज़ा के मौसम में बाग़ ए बहार की उम्मीद अभी बाकी है ।

सेहराओं से गुज़रते बादलों का कुछ तो फ़लसफ़ा होगा , यूँ ही बेमतलब शबनमी बूँदें जलती ज़मीन पर टपकती नहीं ।

उम्मीद रखें किससे, किससे गिला सिकवा करें , जब वक़्त ही खराब हो अपना ज़माने को कौन तोहमतें अदा करे ।