तन्हा खून जम रहा है,

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तन्हा खून जम रहा है,
तन्हा खून जम रहा है,

तन्हा खून जम रहा है,

तन्हा खून जम रहा है वादी ए गुल की रंगत का , दो चार आदम ए लम्स की गरमाहट मिले तो फिर से बाहर आ जाये ।

अधखुली पलकों के झीने चिलमन से , सुनहरी नींद के कुछ अधूरे ख़्वाब झलकते हैं ।

दो वक़्त की रोटी के लाले हैं , फसलें उगाने वाले किसानो के दिलों में मौसम ए गुल के छाले हैं ।

ज़मीने बंज़र किसान बेहाल , धधकती तर ज़मीन से धूधुर उचकती है ।

जाने हसरतों की फितना गीरी हैं कैसी कैसी , और कितनो का घर जलाओगे जाने कितनो का बर्बाद करोगे ।

ज़रा सी इमारतों से नीचे झुकी जो नज़र , यूँ सर ए राह नूर ए नज़र देख कर दिल ए नाचीज़ का नज़ारा बदल गया ।

ऐसा हुआ नहीं की बाग़ में बारिश न हुयी , फिर जाने कैसे रह गया महरूम दिल फसल ए गुल बहार से ।

बसते बसते ये शहर जो बढ़ गया ऐसे , ये गगन चुम्बी इमारतें झोपड़पट्टियों को भी निगल गयीं ।

मेरा मेरे दिल पर इख़्तियार नहीं , तू मेरी संजीदगी पर ऐतबार करे तो करे कैसे ।

फूट न जाएँ गमो के छाले , दिल में तेरा हर लम्स इस क़दर कसकता है ।

जो गुज़र गया वो बस लम्हा मेरा अपना था , बाक़ी के सब नग़मे बस फ़साने हैं ।

चाँद तारों पर जब भी तेरा ज़िक्र छिड़ता है , झिलमिल पालकी में सजी रात गज़ब की ख़ूबरू लगती है ।

मौसम ए तपिस से उतर आते हैं पहाड़ों से नदी नालों तक , बेज़बान नहीं जानते की ये शहर भी आदमखोरों से भरा है ।

हम बुझा के आये अपना आतिश ए शहर , चश्म ए तर चरागों से नशेमन की रोशनी के वास्ते ।

हमने देखे हैं तुम्हारी रंगीनियत के मिजाज़ , खुश्बू हवाओं में तुम्हारे पैग़ाम लेकर के आती है ।

वक़्त बेवक़्त तुम निकला न करो , शहर भर के मौसम की तासीर बदल जाती है ।

कभी समझते अगर दिल के हाल ए दलील को , तहरीर ए मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं था ।