तार्रुफ़ खुद से हुआ,

0
113
तार्रुफ़ खुद से हुआ,
तार्रुफ़ खुद से हुआ,

तार्रुफ़ खुद से हुआ,

तार्रुफ़ खुद से हुआ तो आइना शरमाया ,

सामने जो शख्स खड़ा था वो बहरूपिया निकला ।

हर्फ़ दर हर्फ़ का लहज़ा ग़र मोहब्बत ही मोहब्बत हो ,

तो चाँदनी के सीरे में चाँद डुबोकर लपक जाएँ सारे ।

हम मरे इश्क़ में बेमौत कोई रोने नहीं आया ,

यूँ तो मरते हैं आशिक़ छपता हैं हर्फ़ दर हर्फ़ अखबार की सुर्ख़ियों में भी नाम होता है ।

उठता नहीं है रोज़ इंसान सोच से ,

इरादों के दम से दुनिया सारी क़ायनात है ।

चाँद पर है अब्र ए हिज़ाब ऐसा ,

मामू अपनी ही चांदनी से शरमा रहे हो जैसे ।

 

 

यूँ इश्क़ की तल्खियाँ न उड़ाओ ग़ालिब ,

हम भी तुम्हारे जानिब इश्क़ में कभी सरकार हुए थे ।

बड़ी फ़ुरसत में किया इश्क़ न हुयी हाय तौबा ,

जब मिली सजा ए मौत तब गुनाह समझ में आया ।

संगी साथी छूट गए सब बाबुल तोरे द्वार ,

कैसे हँसू करूँ ठिठोली घर गृहस्थी मूड़े पड़ी झबार

संगदिल ज़माने ने हमें ऐसे हाल ए मुक़ाम में रखा ,

न आह ही भरे न गुमसुदगी का मज़ा ही चक्खा

लिख दूँ फ़लक़ पे नाम तेरा हर लफ्ज़ सजाऊँ ,

पलकों से चुनूँ तारे चाँदनी के तोरे माथे पर बिंदिया लगाऊँ ।

 

 

अल्फ़ाज़ नहीं मिलते जज़्बात थामने को ,

हालात बड़े नाज़ुक दौर ए इश्क़ में हुआ करते हैं ।

इश्क़ मिला न मिला कोई बात नहीं ,

दौर ए आशिक़ी में तोहमत ए बेवफाई ही सही ।

यूँ तो चाहने वालों की कमी नहीं ज़माने में ,

पर दिल के खासम ख़ास कुछ ख़ास हुआ करते हैं ।

नज़रें कतरती हैं चिलमन ,

बातों से हिज़ाब करते हो , अक़्ल से पैदल चले आये ,

जो लब से उर्दू फ़ारसी के सवाल करते हो।

चाँद जलता है मेरे यार का हुश्न ओ शबाब देखकर ,

सर्द रातों में यूँ ही चाँदनी में धुआँ नहीं होता ।

 

http://www.pushpendradwivedi.com/%e0%a4%9c%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%a8-%e0%a4%8f-%e0%a5%9b%e0%a5%80%e0%a4%a8%e0%a4%a4-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%b0%e0%a5%9b%e0%a5%82/

 

ज़र्फ़ की बात में हम लाजवाब हो न बड़े ,

आशिक़ों की ज़ात पर बन आये तो पत्थरों को मोम भी कर दूँ ।

pix taken by google