दिल एक प्यासा समंदर,

0
180
दिल एक प्यासा समंदर,
दिल एक प्यासा समंदर,

दिल एक प्यासा समंदर,

दिल एक प्यासा समंदर , तू सूखी रेत् का झरना

सुरों में मिसरी घोलता है , दौर ए वक़्त का सियासी बस चैन ओ अमन पर मीठा बोलता है

कब तलक अपने ही लख़्त ए जिगर का सौदा करोगे , क़ब्र में झूठ की चादर ओढ़ कर सोये रहोगे

सियासतदानों से चैन ओ अमन की उम्मीदी , दिलों का धोखा आँखों का छलावा है साहेब

छुपे होंगे तेरे आगोश में मूँगे मोती, दामन में तेरे दोनों जहान ख़ाक ख़ाक हैं ।

बड़े बड़े सफ़ीने डुबोने वाला समंदर , खुद के साहिलों पर रेत् के ढेर जमाये रखा है ।

ता उम्र भटकता है साहिलों की तलास में , अनजान मुसाफ़िर को भी किनारे लगा देने वाला समंदर ।

सूख कर भी क़तरा क़तरा खारा खारा है , इन आँखों के समंदर में कितने फसल ए खार छुपा रखे हैं ।

चलो की आज समंदर की लहरों के साथ साथ चलें , कदम ताल मिलाकर के हाल ए दिल का बहरहाल चलें ।

ये समंदर भी न जाने कितने सफ़ीने डुबोये बैठा है , इस जज़ीरे में सूरत ए आदम के न जाने कितने आदमख़ोर रहते हैं

वक़्त के साथ बदल जाते हैं अस्थि पंजर मलबे में , यहाँ जीवित जीवाश्म से तेल निकलवाने की रवायत है

वक़्त की तलहटी में झाँक कर देखो , कितने नायाब नगीने वहाँ पोसीदा हैं ।

बदलते ज़माने की आदम ए सूरत देखकर , वक़्त पहचानने से गुरेज़ करता है

वक़्त की खींची लकीरों का असर , इंसानी चेहरों पर भी अब साफ़ नज़र आता है

जिन अश्क़ों का रोना उन्हें ता उम्र रहा , हमने खैरात में बाँटे हैं समंदर ऐसे

यूँ तो इश्क़ तेरा समंदर से कम न गहरा था , बीच मझधार में भी प्यास अभी बाकी हैं

वक़्त ने लिखी हैं साहिलों पर तहरीरें ऐसी , चाह कर भी कोई समंदर न मिटा पायेगा ।

किसी की बेरोज़गारी में तरस मत खाना , क्या पता तुमसे कहीं ज़्यादा वक़्त बेफज़ूली में वो बर्बाद किया हो