दुआ सलाम न हाल ए पयाम उफ़ ये बेरुख़ी ,

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दुआ सलाम न हाल ए पयाम उफ़ ये बेरुख़ी ,
दुआ सलाम न हाल ए पयाम उफ़ ये बेरुख़ी ,

दुआ सलाम न हाल ए पयाम उफ़ ये बेरुख़ी ,

दुआ सलाम न हाल ए पयाम उफ़ ये बेरुख़ी ,

गुलों को नागवारा गुज़री बेनूर चमन से रुख्सती ।

 

रात की तन्हाइयों का सफ़र है लम्बा ,

लौट के आने में वक़्त लगता है ,

दूर मिलते हैं मेरे अपनों के पलछिन ढूंढ कर लाने में वक़्त लगता है ।

 

बादाकशी से तौबा करके ,

लोग कैसे चले जाते हैं शब् ओ रोज़ हुश्न ओ इश्क़ का सज़दा करने ।

 

इंसान को इंसान से थी नफ़रत बस आदम ए खून का प्यासा बेतहासा रहा ,

आदम ओ आदम की वेह्शत का तमाशा हरसू शब् ओ रोज़ रहा ।

 

ग़म ए उल्फ़त और तन्हाई ,

शब् ओ रोज़ इंसान को ज़िंदा होने का एहसास कराये रखती है ।

 

कोई इश्क़ के फंदे में फंसा कोई इश्क़ में सूली चढ़ गया ,

जो बच गया आफ़त ए उल्फ़त से उसका तमाशा बन गया ।

 

हर रात एक तमाशा है ,

हर सै बुझी बुझी हर शख्स यहां प्यासा है ।

 

हर रोज़ तमाशा हरसू ही हुआ करता है ,

चाँद चलता है फ़लक़ पर और लहरों का नज़ारा ख़ूबरू हुआ करता है ।

 

गुलों की नज़र से न बच सका नज़ारा सारा ,

सेहर होने से पहले मखमल के दरीचे पर बिखरा पड़ा है तमाशा सारा ।

 

शब् ओ रोज़ रंग ओ बू की तलाश रहती है ,

गुंचा ए गुल को खिज़ा के मौसम में जुस्तजू ए बहार रहती है ।

 

अपाहिज होकर भी दिलों में वतन परस्ती का जज़्बा ए पयाम रखते हैं ,

बेगैरत हैं वो जो साबुत होकर भी मजाज़ ए वतन से ख़याल ए हराम रखते हैं ।

 

कानून कायदे के दायरे में बात होती है ,

हर ख़ास ओ आम की इंसानियत से ज़्यादा कहाँ औक़ात होती है ।

 

महज़ काले हर्फों से इन्क़िलाब होगा क्या ,

मजाज़ ए तब्दीलियत के वास्ते ज़र्रे ज़र्रे में गुहार मचनी चाहिए ।

 

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भरम बनाये रखता इब्न ए इंसान का ,

फ़िज़ाओं में हक़ ए मजाज़ की ख़ातिर बग़ावतें सुर्खरू सी हैं ।

pix taken by google