बहकते जज़्बातों से ,

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बहकते जज़्बातों से ,
बहकते जज़्बातों से ,

बहकते जज़्बातों से ,

बहकते जज़्बातों से हालात फिसल जाते हैं ,

तक़दीर के अंगूर कभी कभी लंगूर निगल जाते हैं ।

 

लहू के क़तरा से औक़ात की बात न कर ,

एक चिंगारी भी समंदर को राख़ बना देती है ।

 

रात का तन्हा सफर और मंज़िलों की फ़िराक ,

सुर्ख सफक दिन के उजालों में कदम न लड़खड़ा जाएँ कहीं ।

 

जहां जलते हैं छाले रेत् की तपती ज़मीनो पर ,

मीलों चल के पैदल माँ बीहड़ों से पानी खींच लाती है

 

मोहल्ले बड़े बड़े लोगों के दिल छोटे होते गए ,

पहले गलियों में खेलते थे बच्चे अब घर के गलियारों में मौका ढूढ़ लेते हैं ।

 

 

खिंच गयी सरहदों पर सरहद्दी ,

आँगनों में अँगनाई बनी, बँट गयी जब खाट बिछौने ज़मीन पर दसने लगे

 

कितने टुकड़े और करोगे मेरे लख़्त ए जिगर के तुम ,

गोया गैरों के कहने पर घर दुकान देश माँ बाप तक तो बाँट रखे हो ।

 

बूढ़े माँ बाप थे साथ में रहगुज़र कर लेते ,

जाने कैसी औलादें थी घर के टुकड़े कर सफ़र में चल दिए ।

 

किस्मत से कोई राज़ ए गुल कभी ज़ाया नहीं जाता ,

कोई है सेज़ की सजधज में कोई अर्थी संवारा है ।

 

परिंदों के टूटे पर हवाओं का मिजाज़ तौल लेते हैं ,

बेज़बानी में मादर ए वतन का हाल ए बयानी बोल देते हैं ।

 

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तुम तो कूचों की ख़ाक ए ज़मीन क़दमो में लेकर के निकल गए ,

उन नादान दिलों का क्या जो हर दिन जल कर राख होते हैं ।

 

वो जो तिनके उड़े थे धूल में कभी तेरे शहर को ,

किस्मत बदल गयी जल के तो आफ़ताब हो गए ।

 

सारगर्भित हो तो मधुशाला को तपस्यालय घोसित कर दो ,

बैठे जोगी मदपान करें बैरागियों का स्थान सुनिश्चित कर दो।

 

मुद्दतों बाद मिले हो अजनबी बनकर ,

यूँ गैर से गले मिलकर फिर मुकर तो न जाओगे

 

जश्न बस रात भर का है ,

सुबह सबको खुद उसकी औक़ात बता देती है ।

 

pix taken by google