बेवफ़ाई की कभी इक तरफ़ा,

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बेवफ़ाई की कभी इक तरफ़ा,
बेवफ़ाई की कभी इक तरफ़ा,

बेवफ़ाई की कभी इक तरफ़ा,

बेवफ़ाई की कभी इक तरफ़ा तस्वीर नहीं होती , शाम ए बज़्म में मुँह दिखाई की भी एक रश्म होनी चाहिए ।

हो अगर इश्क़ में गुंजाइस, बाद ए ईद के भी हम दिल को दीदा ए चाँद का तलबग़ार  रखेंगे ।

जिनको मिल जाते हैं मेहबूब चलते फिरते , चाँद तारों में फिर उनके किस्से नहीं होते ।

आज तक जितने भी ज़िक्र ए इश्क़ के सफ़हे थे सारे कोरे थे , हिज्र की रातों में बस चाँद तारों का अफ़शाना सच्चा निकला।

फलक पर चाँद सा ना तकता तुझको सारी रात , उतर जाती जो तेरे दिल में मेरे दिल की सीधी बात

शब् ए महताब विसाल ए यार की तारीख़ मुक़र्रर करके , दीदा ए यार के बाद खुद चाँद ही सरमा गया

चाँद तारों में जब चलती हैं हुश्न ओ इश्क़ की बातें , लहज़े में नज़ाक़त लफ्ज़ दर लफ्ज़ ख़ूबरू होना चाहिए ।

चाँद ने जब पूछा चाँदनी का पता , मैंने हंस के तेरे घर का पता बतला दिया ।

मोहब्बतों की इबादतों ने जिनको ख़ुदा कर कर दिया , हुयी क्या हमसे ही खता इश्क़ के सज़दे में क़लमा पढ़ लिया

जिन्हें मिला नहीं तू चाँद तारों के गलियारे में , क्या ढूंढ़ पाएँगे तुझको तेरे दिल के ही चौक चौबारे में

आसमान में बादल थे फिर निकला क्यों नहीं , कल रात गगन का चाँद मेरे चाँद में उलझा बैठा था सोया ही नहीं

थक के सो लेता है फुटपाथ पर पन्नी बिछा के , क्या बात है मज़दूर को एक मच्छर नहीं काटा

घाँस फूस के छप्पर से टपकती हैं कम बूँदें , उसमे रहने वालों के रोने से मकान ज़्यादा गीला होता है ।

सहादतें लाख हुयी हो कैसे, बूढ़े माँ बाप से बेटे के जनाज़े को कांधा दिया नहीं जाता ।

बाप को बिदाई का दर्द क्या कम था , जो दहेज़ के लालचियों ने बेटी को ज़िंदा जला दिया ।

दिल को समझाए कौन दर्द का केंद्र बिंदु मस्तिष्क है , धमनियाँ तो बस दुखों का प्रवाह किया करती हैं ।

दर्द ए दिल का इलाज़ कब मिला करता था दवाखानो में , अब तो नीम हकीम भी निकलने लगे इश्क़ के मरीज़ ए दानाई