महरूम हैं बच्चे,

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महरूम हैं बच्चे,
महरूम हैं बच्चे,

महरूम हैं बच्चे,

महरूम हैं बच्चे फ़क़त हर दिन निवाले के लिए ,

और वहाँ सैय्याद बन बैठा सियासी जेबें भरता रोज़ है ।

बहुत दूर तक असर करती हैं वो सदायें ,

जो अँधेरों में घुट घुट के मरती हैं ।

ज़र्द पत्तों में फैली दास्तान ए इश्क़ हरसू ,

जो कभी मोहब्बतों के कहकशां से बाग़ ए बहार गूँज जाते थे ।

गोया अदावतों से ज़ुल्फ़ें सँवारने की अदा ,

दूजा चाँद का शरमा के घटाओं में छुप जाना ।

जिग़र में लफ़्ज़ों का उतरना ही असर करता है ,

अदद सफ़हों में हर्फ़ दर हर्फ़ की तस्बीह नज़र आती है ।

 

 

मोहब्बत जहाँ बेशुमार होती है ,

अदद एक से बढ़कर एक अंदाज़ ए अदायगी मुखड़ों में बयान होती है ।

खुमारी रगों में मेरे अब तलक तो उतरी नहीं ,

मोहब्बत ही तेरी चश्म ए हरम से बह गयी शायद ।

बुतों के शहर में बुतों को सज़ा ए मौत के फरमान दिए जाते हैं ,

सियासी ताक़त की खुमारी में गुनाहों पर गुनाह किये जाते हैं ।

शहर ए आदम पर ख़ुमार मोहब्बतों का रोज़ चढ़ता नहीं ,

फ़रसूदा सी आशिक़ी के अफ़साने भी पुराने हैं ।

तेरे आने की ख़ुशी न तेरे जाने का गम ,

बरहम न ख़ुमारी रही जब तू न हमारा रहा ।

 

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दूर कहीं आह का फुवां उठता है ,

जब दरमियानी रात के दायरे में धुआँ दिखता है ।

तेरे वादे पे जीते हम तो तन्हा मर न जाते ,

दिलों के मार्फ़त निकली तबाही में क्या आशियाना बनाते ।

कभी किसी के बाप ने टंगड़ी तुड़ाई ,

कभी हमारे अब्बू अम्मी ने टँगड़ी अड़ाई ,

इस तरह वाल्देन के चक्कर में पड़ के हम कुँवारे रह गए ।

आदम को आदमियत की खुमारी भा गयी ,

तुम तो ठहरे मुजस्सिम ए बुत अब बुतों को कौन सी बीमारी खा गयी ।

बदगुमान न करदे कहीं मोहब्बत का मुझको सुरूर ,

गर ख़ुमारी में बहकूँ बढ़ के थामिए मेरे हुज़ूर ।

pix taken by google