मुशाफ़िर क्या जाने

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मुशाफ़िर क्या जाने
मुशाफ़िर क्या जाने

मुशाफ़िर क्या जाने

मुशाफ़िर क्या जाने शहर ए मिजाज़ कैसा है ,

चमकते रास्तों के पत्थर दिलों के अंदरूनी हालात बयान नहीं करते ।

क़ाफ़िलों में गुज़रता है मुसाफिरों का कारवाँ ,

रज प्यार के मिले तो माथे पर सजा लूँ ।

हमने तुझको खोया इस बात का है ग़म ,

एक तू है जो मुस्कुरा के भी आँसू बहा रहा है ।

धड़कते दिल पर तेरो यादों का बोझ रहता है ,

चाँदनी चाँद की होकर भी बादलों में छुपी हो जैसे ।

ये जो चाँद तारों पर चलती बात है महज़ बात नहीं ,

लहद मेहबूब किसी और का उससे भी हसीं होगा ।

 

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हाथों में ज़ख़्मी दिल लिए फिरता रहा क़ाफ़िर ,

लोग फिर भी कहते रहे रात का मुशाफिर है कोई रास्ता भटक गया होगा ।

मिलती नहीं है थाह मुझे अपने आप में ,

फिर भी तू कह रहा है तेरे दिल में मेरे लिए जगह ही नहीं है ।

वो सोयें सेज़ पर तन कर ,

गोया सर्द रातों में हम तन्हा अकेले ठण्डी आहें भरते हैं ।

ज़ौक़ नहीं है शायरी कर लूँ ,

बस तक़ाज़ा ए इश्क़ कलम करता हूँ ।

हमको तो जितने भी मेहबूब मिले बेवफ़ा मिले ,

खुदा करे तुम्हारी मोहब्बत बड़ी लाजवाब हो ।

 

 

तेरी नज़रें हैं या नमक का दरिया ,

जो भी मुशाफिर डूबता है पूरा का पूरा नमक हलाल नज़र आता है ।

इतनी भी बेशब्री भी अच्छी नहीं जानिब ,

एक उम्र का फ़लसफा है घडी दो घडी तो ठहर लो ।

एक एक सुनहरे बाल की अपनी एक कहानी है ,

कुछ उम्र ए तक़ाज़ा है कुछ आँख दीवानी है ।

वो कहते हैं इश्क़ में तेरे हम बेवफ़ा मरे जाते हैं ,

अब कौन वादे वफ़ा को दफ़नाने की ज़हमत उठाये हम खुद ही दफा हुए जाते हैं ।

कहते हैं मैखाने में इबादत नहीं होती ,

कोई ऐसा बताओ जो पैमाना उठाते वक़्त मेहबूब ए इलाही को न याद किया हो ।

 

 

pix taken by google