मौसम ए दस्तूर है उड़ाने का ,

0
152
मौसम ए दस्तूर है उड़ाने का ,
मौसम ए दस्तूर है उड़ाने का ,

मौसम ए दस्तूर है उड़ाने का ,

मौसम ए दस्तूर है उड़ाने का ,

सज़र के सूखे पत्ते कब तलक आँगन में यादों का घर बनाएंगे ।

ऐसे शेर न डालों यारों दिल के ज़ख्म फूट जाते हैं ,

पूंछो उन प्रेम भक्तों से मेहबूब की गलियों के चक्कर काटते जिनके चप्पल भी टूट जाते हैं ।

दर ओ दीवार पर चस्पा हैं यादें तेरी ,

अब मौसम ए हिज्र में खिजां आबाद करेगी ।

नश्लीयत बदली वल्दीयत बदली नशीहत देने वाले बदल गए ,

मगर दिल की वशीयत पर कब्ज़ा आज भी उसका है ।

ज़ब्त यादों के सीने में कुछ दरीचे हैं ,

कभी ओढूँ कभी बैठूँ कभी उस पर ही सो जाता हूँ ।

 

http://www.pushpendradwivedi.com/%e0%a4%a8-%e0%a4%97%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%9a%e0%a4%be-%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a4%b8%e0%a4%b2%e0%a4%a8-%e0%a4%b8%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%a6%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4/

 

खट्टी मीठी यादों सी दिल के तबे पर छनकती कभी ठण्ड में ठिठुरती ,

कभी अनमोल कभी बेमोल ,

तोल मोल के खर्च कर पचास ग्राम की है ज़िन्दगी ।

वक़्त भी करवटें लेगा ,

कमीज में सिलवटें होगी , तू आगे बढ़ना सदा , मंज़िलें तय अभी और करनी है ।

कुछ रात के टुकड़े हैं चाँद से मुखड़े के ,

दिन भर जोड़ कर टुकड़े मैं रात रोशन करता हूँ ।

कुछ टुकड़े संजोता है ,

कुछ यादें भिगोता है ।

इश्क़ वाले कहाँ अंजाम की परवाह करते हैं ,

ये तो बस मेहबूब का नाम लेते हुए शूली में चढ़ते हैं ।

 

मिलते जुलते लफ्ज़ क्या शख्स भी हो सकते हैं ,

मगर अपनी स्पीशीज की हम आख़िरी शख्सियत हैं यारों ।

इश्क़ कर लो सारी फिलॉस्फी धरी रह जाएगी ,

खूँ इधर दिल उधर जान न जाने कहाँ तड़पड़ाएगी

जब वो प्यार से कहती है कमीने कब सुधरेगा तू ,

गोया उसकी बोली नीम के रस में शहद घोलती हो जैसे ।

जलकुकड़ी सी खड़ी दूर से टुकुरती है ,

ज़िन्दगी कहीं ये तू तो नहीं जो हर पल मेरे साथ साथ चलती है ।

दामन बचा के निकला हूँ वादी ए बहार से ,

खिजां ए मौसम में वीरानियों से दिल आबाद करेंगे ।

pix taken by google