लबों में तिश्नगी दिलों में,

0
127
लबों में तिश्नगी दिलों में,
लबों में तिश्नगी दिलों में,

लबों में तिश्नगी दिलों में,

लबों में तिश्नगी दिलों में दीदार ए यार की फ़िक़्र , सुकून ए दौर में हिज़ाबों की बात होती है ।

इश्क़ का दरिया है साहेब , जो जितना गहरा डूबेगा वो उतना लंबा जायेगा ।

ज़माने की भीड़ में कहकशां तो बहुत हैं , कानों में घोल दे वो सुखन कि बस चैन की नींद आ जाये ।

पल भर में गवाँ देगा उम्र भर की कमाई , ये इश्क़ की बीमारी कम्बख़्त लाईलाज़ है ।

बर्दास्त की हद होती है , जब श्याम स्याह रातों में सुकून ए दिल को चाँद की तलास होती है ।

बड़ी खूबसूरती से सजाये बैठे हो मयख़ाने में सुकून ए शबाब , दो ज़ाम छलक जाए तो बहार आ जाये ।

यहाँ मैं खुद से बात करता हूँ वहाँ चाँद तारों में रात कटती है , यहाँ विसाल ए यार नहीं मिलता वहाँ शब् ए बरात हर रोज़ सजती है ।

सुकून देता है तेरा ख़्वाबों में आना जाना , जागती आँखों से तेरा अफ्ताबी हुश्न देखा नहीं जाता ।

सुकून मिलता अगर गुलों को मखमली बिस्तर में , वतन परस्तों के लिए रोज़ यहां काँटों की सेज़ न सजती

ता उम्र कितनी जद्दोज़हद में जीते हैं लोग , गोया एक सुकून कि नींद भी मयस्सर नहीं होती

देखा है हमने भी इश्क़ ए ऐवज़ का असर , बस एक गलती कि ख़ातिर दिल खामियाज़ा ता उम्र भरता है

जितनी ग़फ़लतें थीं पाले बैठे थे , वो लौट कर आएँगे बस इसी उम्मीद में दिल सम्हाले बैठे थे ।

माना कि हर शक़्स एक सज़ा का हक़दार होता है , दिल ए नादान कि गलतियों ने भी गज़ब का ज़ुल्म ढाया है ।

किसी दौर में लहरों के साथ बहती नहीं थी मोहब्बत , आज भी नफ़रतों के खिलाफ जंग ज़ारी है ।

लोग कहते हैं मोहब्बतों कि उम्रें हो गयीं साहेब , यहाँ दौर ए उल्फ़त के पैगाम कब बैरंग जाते हैं

न होते नशे में शहर भर के नशेमन तबाह कभी, इश्क़ को ग़र इश्क़ ही रहने देते ।

हमसे दुश्मनों से नफरत होती नहीं , लोग जाने कैसे माशूकों पर वार करते हैं ।