वो शौऱीदगी नज़र की कुछ इस तरह से खल गयी ,

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वो शौऱीदगी नज़र की कुछ इस तरह से खल गयी ,
वो शौऱीदगी नज़र की कुछ इस तरह से खल गयी ,

वो शौऱीदगी नज़र की कुछ इस तरह से खल गयी ,

वो शौऱीदगी नज़र की कुछ इस तरह से खल गयी ,

काँटे भर की सुई खंज़र बनकर जिगर में उतर गयी

दाग़ क्या दोगे ज़माने वालों ,

हमने अदावत ए यार के ज़ख्म सीधा जिगर में खाये हैं

दरमियाँ ए दिल फासले थे इतने ,

दिल ख्वामख्वाह दरख़्तों की टहनियाँ तोड़ता रहा ।

ताउम्र दिल उसकी हिमायत करता रहा ,

जो दिल के ज़ख्मों को सहला सहला कर के ज़ख्म देता रहा

गिन गिन के हिज्र की तन्हाइयों का हिसाब होता है अदद ,

तब कहीं जाकर के सेहरा बेनक़ाब होता है ।

 

शेर ओ सुखन के क़ाफ़िले यूँ रात दिन चले ,

दिलों के बारहां से निकले दिलों तक पहुचे भी दिन ढले ।

यूँ तो मसीहा है अपने नशेमन का हर शख्स यहां ,

ख़बर किसी को नहीं कौन किसकी परस्तिश में ग़ुम है क्यूँ और कहाँ ।

वक़्त ने भर दिए ज़ख्म सारे ,

दिल में फिर भी रह रह के फ़िर भी कुछ कसकता ।

हमने तन्हा गुज़ारी हैं सिसकती रातें कितनी ,

शब् ए माहताब आस्मां क्यूँ रो रो के सितम ढा रहा है ।

क़फ़स में रूहों को सुकून मिलता नहीं ,

उस पर लोगों का ताना तुम्हारी जान लेकर के जा रहे हैं हम ।

 

करम फरमा रही हैं उसकी यादें ,

हिज्र की रातों में बारिश के संग क़हर बरसा रही हैं उसकी बातें ।

जब भी चाँद तारों से बात होती है ,

कुछ ख्वाब दौर ए उल्फ़त के आज भी सोने नहीं देते ।

आशिक़ के उठते जनाज़े की गुज़ारिश है ,

ख़ाक ए सुपुर्दगी के पहले भी सेहरा गाया जाए ।

सोचता हूँ इस रात की नीयत सवार दूँ ,

सज़दा ए इश्क़ में फ़लक़ के चाँद तारे ज़मीन पर उतार दूँ ।

हाँथ सेकोगे तो जल जायेगा ,

सब्ज़ बागों को उजाड़ा भी इब्न ए इंसान ही है ।

 

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ख़ुद के आदम ए ख़ुल्द को ही जला कर निकला ,

आज का इंसान कितना खुदगर्ज़ निकला ।

pix taken by google