सफहों में और लिखे थे मोहब्बत के फ़लसफ़े ,

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सफहों में और लिखे थे मोहब्बत के फ़लसफ़े ,
सफहों में और लिखे थे मोहब्बत के फ़लसफ़े ,

सफहों में और लिखे थे मोहब्बत के फ़लसफ़े ,

सफहों में और लिखे थे मोहब्बत के फ़लसफ़े , देखा अंजाम ए इश्क़ तो मायनें बदल गए ।

तुम तो अपनों के साथ जश्न मनI लेते हो ग़ालिब. हमारी खुशियां भी ग़ैरों के साथ में आमादा हैं ।

जनाज़ों को काँधे की रवायत है शहर में , ज़िंदा लाशों को मगर कोई सहारा नहीं मिलता ।

एक आखिरी ख़्वाहिश की तरह थी मोहब्बत तेरी । अब ज़िन्दगी से कोई इल्तेज़ा नहीं करता ।

पुश्तों से जैसे ख़ाली वीरान मिल्क़ियत , तेरी मोहब्बत से दिल मीनार ए मस्कान बन गया ।

हमारी प्यास बुझे न बुझे बेफ़िक़्र रहो , पहले ये बताओ तुम्हारा जाम कितना ख़ाली है ।

हमने देखी हैं लकीरों से बदलती किश्मत , लाख चाहे कोई कितना ज़र ओ जुगाड़ करे ।

ख़ुशनुमा चेहरों की रंगतें बदल गयीं , उम्र ए दराज़ की जिश्म पर सिलवटें उभर गयीं ।

भरी भीड़ में सो लेते बेमस्कान की तरह, कमबख्त नींद नहीं होती जब तेरी यादों का क़ाफिला होता है ।

एक मुख़्तसर सी मुलाक़ात और ज़िन्दगी वीरान बेपनाह , हर वक़्त दिल की देहलीज़ पर तेरी यादें हैं मुसलसल

इक मशवरा मान मेरा तू भी शाकी .कुछ ग़म ज़िन्दगी से तू भी ले ले उधार में शाकी  ।

फिर एकतरफा न ग़म ए उल्फ़त का इल्ज़ाम रहेगा शाकी ।

अपनी शाम ओ सेहर रोशन थी उनके ही दम से , अब चाँद तारों में रात कटती है ।

दो पल राहत ओ सुकून के, ज़िन्दगी तमाम उम्र ढूढ़ती है दर- बदर ।

अपनी मासूमियत पर खुद हमें यकीन  नहीं होता , वो हर रोज़ कहके जाता है दिल से नादान हो बड़ी गहरी चोंट खाओगे तुम I

कौन करता है इश्क़ अंजाम ए वफ़ा की परवाह किये बगैर , ग़म तो तब होता है जब इश्क़ जुदा होता है अलविदा किये बगैर ।

मन के मानस पटल पर उपस्थिति दर्शाते चेहरे , जीवन के चलचित्र पर दर्द का सबब बनते हैं ।

कहाँ को निकली कहाँ पर फिसली है , कलम भी तेरी आदत ए फ़ानी पर बहकी बहकी है