सरगोशियों से क़त्ल होते हैं,

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सरगोशियों से क़त्ल होते हैं,
सरगोशियों से क़त्ल होते हैं,

सरगोशियों से क़त्ल होते हैं,

सरगोशियों से क़त्ल होते हैं इश्क़ करने वाले ,

लबों पे न गिला शिकवा न दिलों के दिखते हैं छाले

उल्फ़त ए दौर में ज़बान और लफ्ज़ संग चल नहीं पाते ,

जो एक सम्हलता है कमबख्त दूजा लड़खड़ाता है ।

मत पूछ मेरे दिल से ग़ालिब का ख्याल क्यों आया ,

नज़रें उठा के तूने आशियाना ए दिल को ढहाया ।

तन्हाइयों में हवा संग ख़ुश्बू ,

सरगोशियों में तेरे शहर का हाल ए मुआइना होता है ।

हो जश्न मुबारक़ तुझे मेरी तबाही का ,

गोया गर मर्ज़ी तेरी इसी में है मैं हर रोज़ ख़ुदकुशी करूँ ।

 

 

कुछ सम्हाला गर्दिशों ने कुछ हमने हिम्मत की ,

ले देके गनीमत थी मंज़िल ए मक़सूद हुए हैं ।

ता उम्र अपनों को छनवाई ख़ाक आँखों से ,

जो गैरों के लिए दिल में मोहब्बतों का गुबार लिए फिरते हैं ।

लिबास बदलने से कोई पाक नहीं होता ,

दिल से साफ़ होना पड़ता है ख़ुदा की बंदगी के लिए ।

बिन तेरे बहारों में हिना रचती नहीं ,

अब तो हर मौसम खिज़ा का लगता है ।

दिल में सावन भादौ की झड़ी लगती है ,

गोया आँख हैं जो दो बूँद छलकती भी नहीं ।

 

 

हमने शराब क्या छोड़ी ,

मैक़दे दर पे हमारे खुद ही लड़खड़ाते चले आये ।

कूत भर तोंद सम्हाली नहीं जाती ,

अब बच्चे कहते हैं चच्चा फाइटर टोड बनो ।

डस गयी रात बैरन नागिन बनकर ,

काली ज़ुल्फ़ों सी घनेरी थी कहीं पानी न मिला ।

हसरत अभी भी है मेरे जनाज़े में वो आएँ ,

मुस्कुराएँ हमें देखकर गोया ताकि चैन से हम सो पाएँ ।

माँ से सुबह हो मेरी माँ से ही शाम हो ,

अब किस ख़ुदा की बंदगी से मामला तमाम हो i

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यूँ सोख निगाहों से न जलवा बिखेरो यार ,

मुमकिन है आगे और भी दिल ए सब्ज़ बाग़ हरे हों ।

उलझी उलझी लटों में फिर उलझ गयी रात ,

वो सुरमयी आँख के इशारे तिलिस्म बातों का ।

pix taken by google