ख़ाक सारी है बहुत,

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ख़ाक सारी है बहुत,
ख़ाक सारी है बहुत,

ख़ाक सारी है बहुत,

ख़ाक सारी है बहुत इश्क़ में उतर के तो देख ,

यूँ उठते धुएं को देख कर दबी चिंगारी का अंदाज़ा लगाया नहीं जाता ।

उफ़ जान न ले ले कहीं ये बेरुख़ी तेरी ,

आँखों से बहता काजल और जलवों से उड़ती ज़ुल्फें तेरी ।

दिन में सोके रात भर आस्मां के तारे चुरायेंगे ,

सोने वालों को ख़्वाब देखने दो हम उनके चाँद को भी अपना बनाएंगे ।

ग़ालिब हुआ है कोई , कोई शायर हुआ ,

सज़दे किये किसी ने कोई इश्क़ में फ़नाह हुआ ।

ग़ालिब शराफ़त में मरे मोहल्ले की लड़कियाँ दिन रात आहें भरे ,

इसे आपा उसे ख़ातून किसी को मोहतरमा सलाम करके हज़ को चले ।

 

 

बड़े गिले शिकवे जो तह ए दिल में पाल रखे हैं ,

महफ़िल में कभी हंस कर ही कह देते हाल ए दिल सुनाओ यारों ।

आँख लग कर भी नींद आती नहीं ,

हिज्र की रात का सीने में वज़न ज़्यादा है ।

मुस्कुरा कर देख ही लिए थे तो ,

यूँ पलकें झुका कर दाँतों तले होंठ दबाना तो न था ।

मन भटकता फिरता है चाँद के पीछे ध्रुव तारा बन कर ,

गुनगुनाता रहता है यादों का भंवर एक तारा बनकर ।

बस मौसम की नज़ाक़त का असर है हरसू ,

मोटी खाल वाले भी कभी ज़ौक़ ए इश्क़ किया करते हैं ।

 

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ख़ुदाया ख़ैर करे उसका जिसका तू मेहबूब बने ,

हमे तो जब भी मिले तुम बहुत खूब मिले ।

सर पे बाँधे हो कफ़न लब पर मेहबूब का नाम हो सजाये ,

हाँथो में मोहब्बत का परचम लहराए कोई तब इश्क़ के समर में कूंद जाए ।

बेहयाई के सबब हैं ये दाग़,

राज़ गहरे है दिल की गर्तों में छुपा रखे हैं ये दाग़ ।

पीर फ़क़ीर बड़े बड़े साधु सन्त बने ,

बने महंत बड़े इश्क़ में मलंग बनने के बाद ।

तन बहे गंगा की लहरों में साँस निकलने से पहले ,

भरें पेट जलचर नभचर मांस से मेरे प्राण निकलने से पहले ।

 

pix taken by google