गरीब की आह सत्य घटना पर आधारित heart touching short story .

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गरीब की आह सत्य घटना पर आधारित heart touching short story .
गरीब की आह सत्य घटना पर आधारित heart touching short story .

गरीब की आह सत्य घटना पर आधारित heart touching short story .

दसईयाँ एक बहुत ही भोला भाला अनपढ़ आदिवासी मजदूर है जंगल से सटा उसका एक गाँव है जंगल ही एक मात्र उसका

जीवको पार्जन का साधन है फिर हुआ यूँ की नियम बदले कानून बदले जंगलों की कटाई पर रोक लगा दी गयी वहाँ के

रहवासियों को जंगल विभाग की तरफ से रोज़गार दिया जाता था उससे जो मजूरी मिलती थी उसी से वहाँ के आदिवासी

अपना पेट भरते थे ,

दसईयाँ बहुत ही ईमानदार मेहनतकश मज़दूर था , उसके लिए मालिक भगवान् तुल्य होते थे एक कप चाय पिला दो उसे

बहुत खुश हो जाता था और अगर खाना खिला दिए तो चाहे चौबीसों घंटे काम करवा लो दसईयाँ मना नहीं कर सकता था।

bhoot wali darawni kahaniya,

तो चलिए सीधा पहुँचते हैं कहानी पर , जंगल में नया अफसर आया गाँव के लेबर मज़दूरों ने जी जान से मेहनत की

जब पेमेंट का टाइम आया तो उन्हें यह कहकर पेमेंट देने से मना कर दिया गया , बोला गया की अभी पेमेंट नहीं आया है

पहले ई पेमेंट की व्यवश्ता नहीं थी मज़दूरों का पेमेंट काम के बाद ही होता था , दूसरा महीना चलो हो गया दसईयाँ बेचारा

मज़दूर आदमी एक महीने तो जैसे तैसे कर्ज़ा लेकर चलाया फिर वो दूसरे महीने ऑफिस गया पूछा पेमेंट कब मिलेगा वही

जवाब आया अभी पेमेंट नहीं आया है , दसईयाँ सीधा फारेस्ट अफसर के पास गया बोला साहेब पेमेंट कब होगा हम भूखों

मर रहे हैं , फारेस्ट अफसर ने बोला ( जब भूखों मरते हो तो फिर काम क्यों करते हो ) उसकी ये बात सुनकर दसईयाँ

अपने आंसू पोंछता वहाँ से चला गया ।

असलियत में फॉरेस्ट अफसर नंबर एक का शबाबी कबाबी ऐय्यास था , वो लेबर पेमेंट का सारा पैसा सट्टे में लगा कर हार

गया था , ख़ैर दिन बीतते गए बात मंत्री मिनिस्टर तक पहुंची खूब पेपरबाजी हुयी हारे दांव अफसर ने कहीं से पैसों का

बंदोबस्त करके छै महीनो बाद लेबर का पेमेंट किया , और इन्ही सब गड़बड़ियों के चलते उस अफसर का वहाँ से तबादला

हो गया , साल दो साल बाद ख़बर आयी की उस अफसर को नौकरी से टर्मिनेट कर दिया गया है चूँकि वो हरिजन था

उनके लिए अलग कोर्ट कचहरी के कानून होते हैं , किसी तरह लड़ झगड़ के ६ साल बाद नौकरी तो वापस पा लिया पर

उसकी ऐय्यासी की वजह से वो ज़्यादा दिन तक जी नहीं पाया और एक रात हार्ट अटैक से उसकी ज़िन्दगी की इहलीला

समाप्त हो गयी , अब बीवी नौकरी पा गयी है और अपने बच्चे पाल रही है ।

अब दसईयाँ भी इस दुनिया में नहीं है गरीबी की मार कब तक आदमी सह सकता है पचास पचपन की उम्र मेही

दसईयाँ भी ऊपर वाले को प्यारा हो गया ।

इति सिद्धि येत

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pix taken by google