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नदी के भूत का प्रेम प्रसंग

नदी के भूत का प्रेम प्रसंग

(अवधी छूआँ + प्यार अउर भ्रम वाली लघु कथा) दृश्य १: ससुराल के अँधियार घर समय: साँझ के बाद, सूरज ढल चुकल बा (करीब सात बजे) स्थान: पुरान गाँव के मकान, रसोई अउर आँगन दृश्य कोण: विस्तृत दृश्य से शुरू – पूरा घर अँधियार में डूबल बा। मध्यम दृश्य – रसोई में झुकल नायिका। निकट दृश्य – ओकर चेहरा पर आँसू अउर थकान। प्रकाश व्यवस्था: मंद पीयर बल्ब + खिड़की से आवत हल्की चाँदनी। ज्यादातर छाँह। चेहरा पर हल्की बगल वाली रोशनी जेकरा से आँसू चमके। संवाद: सास (कड़क आवाज़): “अरे बेकार की! रोटी जर गइल फेर! तोहार पति शहर में कमावत बा, तू इहाँ खाली खाना बर्बाद करत बाड़!” ननद (हँसते हुए): “भाभी जी, शहर वाले पति के याद करके रोवत बाड़? ऊ त भूलि गइल होई तुहका!” नायिका (धीमी आवाज़, सिर झुकाए): “माई जी… आज दिन भर खेत में काम कइली… थक गइली… थोड़िक बैठे देहु…” सास: “बैठे के समय नइखे! कुआँ सूखल बा, नदी से पानी भर के ल्याव… जल्दी कर!” दृश्य: नायिका पानी के घड़ा उठाके बाहर जात बा। पीछा करता दृश्य – ओकर पीछे सास के छाँह लंबी पड़त बा। दृश्य २: नदी के किनारा – पहिला मिलन (संकोच अउर हिचकिचाहट) समय: साँझ के बाद, करीब सात-साढ़े सात बजे स्थान: गाँव के नदी के किनारा, घना पेड़ अउर बहत पानी दृश्य कोण: नीचे से लिया गया दृश्य – नदी के पानी चमकत बा। कंधे पार दृश्य – नायिका नदी किनारे घड़ा रख के बैठत बा, सिर झुकाए। अचानक कट – युवा पुरुष पहिले पेड़ के पीछे, फेर एकदम पानी के किनारे देखाई देत बा (जगह बदलल)। प्रकाश व्यवस्था:

चाँदनी + पानी से उछलत नीली-चाँदी रोशनी। युवा के कपड़ा पर चमकदार सिल्वर-गोल्डन चमक। ओकर आवे पर हल्की कोहरा + ठंढी नीली रोशनी। नायिका के चेहरा पर नरम चाँदनी।

संवाद: नायिका (अकेले, बहुत धीरे, लगभग फुसफुसा के): “हे भगवान… ई सब कब ले चलत रहई…” (अचानक एक नौजवान पुरुष देखाई देत बा – चमकदार सफेद-चाँदी धोती अउर कुर्ता, चेहरा सुंदर अउर युवा, आँख में जादू।) युवा (बहुत नरम, मीठी आवाज़): “रो मत… तोहार आँसू नदी तक पहुँचल बा।” नायिका (सिर झुकाए, बहुत संकोच से, आवाज़ काँपत): “हम… हम तोहरा नइखीं जानत… काहे बोलत बाड़ हमसे?” युवा (धीरे-धीरे नजदीक आवत, जगह थोड़ा बदलत): “हम इहाँ के रहने वाला बानी… तोहार आवाज़ सुन के रुक गइलीं। अगर नइखे मन त हम चले जाईं।” नायिका (अभी भी झिझकत, एक-एक शब्द निकालत): “न… नइखे… बस… घर में… बहुत… तंग करत बाड़ीं…” युवा (धैर्य से, विश्वास जगावत): “हम सुनब… जब मन होई तब बोलिह। हम काहू से नइखीं कहब। तोहार दुख हमार दुख बा।” नायिका (हल्की नजर उठा के, फेर झुका के): “हम… थक गइलीं…” युवा (मुस्कुरा के, आवाज़ में जादू): “थकल बाड़ त बैठ। हम इहाँ बानी। जब चाहब तब आव।” दृश्य: निकट दृश्य – नायिका के आँख में पहिल बेर हल्की राहत, लेकिन अभी भी डर अउर संकोच बा। युवा अचानक पेड़ के छाँह में गायब होत बा (जगह बदलल)। नायिका हैरान अउर थोड़ा उलझन में रह जात बा। दृश्य ३: हर रात के बात – विश्वास बढ़ना अउर माया के जाल समय: अगला कई रात (सब सो जाए के बाद, करीब नौ-दस बजे) स्थान: वही नदी के किनारा दृश्य कोण: कई निकट दृश्य – नायिका अब थोड़ा खुल के बोलत बा, युवा सुनत बा। अचानक कट – युवा एक पल में बाएँ किनारे, फेर दाएँ किनारे (जगह बदलत रहत बा)। ऊपर से लिया गया दृश्य – दूनो नदी किनारे, चाँद ऊपर। धीमी गति – नायिका के आँसू पानी में गिरत बा, युवा के हाँथ हवा में नजदीक आवत बा। प्रकाश व्यवस्था: हर दृश्य में थोड़ा अलग – कभी नरम नीला, कभी हल्की हरी कोहरा। युवा के चमकदार कपड़ा हमेशा चमकत रहत बा। नायिका के चेहरा पर धीरे-धीरे चमक बढ़त जात बा। भ्रम अउर माया के भाव आवे पर हल्की गुलाबी-बैंगनी रंगत मिलावल बा। संवाद (दृश्य श्रृंखला में छोटा डायलॉग – अब आराम से): नायिका (अब थोड़ा सहज): “आज फेर सासु बहुत डांटल… कहलस पति के पैसा खाली ओनकरे बा… रात में चुपचाप निकलि अइली तोहरा पास…” युवा (मीठी आवाज़, अचानक ओकर पीछे से बोलत): “सुन्दर, अब त बोलत बाड़… अच्छा लगल। दर्द छुपावे से बढ़त बा… हमका सब बताव।” नायिका (हैरान, मुड़ के देखत): “तू… कइसे अचानक पीछे आ गइल?” युवा (मुस्कुरा के, फेर सामने आ जात बा): “नदी के किनारे हमारा जगह बा… हम जहाँ चाहत बानी, उहाँ पहुँच जात बानी। तोहार आवाज़ सुन के हमार दिल भी हिलत बा। तू हमार माया में आ जा… दुख भूल जा।” नायिका (आँख में प्यार अउर भ्रम, अब बिना झिझक): “कभी-कभी सोचत बानी… नदी में कूद जाईं… पर अब नइखीं कूदत… काहे कि तू मिलत बाड़… तोहार बात में कवनो जादू बा… तू कवन बाड़ सच में?” युवा (आवाज़ में प्यार अउर फँसाने वाला स्वर): “हम तोहार दुख सुनए वाला बानी… तोहार प्यार पाए वाला। आ जा हमार माया के जाल में… जहाँ दुख नइखे, खाली प्यार बा। तोहार मन के भ्रम हम दूर करीं… अउर नया भ्रम देब – हमार प्यार के।” नायिका (हल्की मुस्कान, आँख झुकाके, मोहित): “हमहूँ… तोहार बात सुन के… तोहार प्यार में पड़त जात बानी… तोहार माया हमका बाँधत जात बा… हम समझत नइखीं तू कवन बाड़… पर तोहरा छोड़ि नइखीं सकत…” दृश्य: आखिरी निकट दृश्य – नायिका अउर युवा के आँख मिलत बा। युवा अचानक ओकर बाएँ से दाएँ तरफ चले जात बा (जगह बदलल)। नायिका के आँख में जादू अउर भ्रम चढ़ल देखाई देत बा। दृश्य ४: बिहान के रोशनी – माया में डूबल फैसला समय: बिहान, सूरज उगते स्थान: नदी किनारा → घर के आँगन दृश्य कोण: सुनहरी बेला वाला विस्तृत दृश्य – सूरज निकलत बा, नदी चमकत बा। पीछा करता दृश्य – नायिका घर लौटत बा, कंधा सीधा, आँख में नया जोश अउर थोड़ा मोह। निकट दृश्य – सासु के चेहरा हैरानी से देखत बा। आखिरी दृश्य – नदी के तरफ वापस देखत नायिका, आँख में प्यार, दर्द अउर भ्रम दूनो। प्रकाश व्यवस्था: गर्म सुनहरी धूप। नदी पर चमकत किरन। घर के भीतर भी हल्की रोशनी फैलत बा। पहिले के अँधियार के उल्ट पूरा दृश्य उजियार। नदी के याद आवे पर हल्की नीली-बैंगनी रंगत फेर से आवत बा, जे माया के संकेत देत बा। संवाद: सास (हैरान): “इतना सबेरे कहाँ से आवत बाड़? चेहरा चमकत बा…” नायिका (शांत लेकिन दृढ़ आवाज़, आँख में मोह): “माई जी… नदी किनारे बैठ के सोचलीं… पति जब लौटी त ओका एक मजबूत मेहरारू मिली, रोवत वाली नइखे। आज से हम काम करीं… पर इज्जत से।” ननद (चिढ़कर): “अरे सुन त… कवन से अनजान जवान से बात करे लगल बाड़ का?” नायिका (मुस्कुराते हुए, आँख में नम अउर जादू): “हाँ… नदी किनारे एक युवा मिलल… पहिले बहुत झिझकल रहीं, पर ओकर बात सुन के दुख हल्का होत बा। अउर… ओकर प्यार में हम पड़ि गइलीं। ओकर माया के जाल में हम फँस गइलीं। अब हम बाँटी नइखीं… बदलीं। पर ओका कभी नइखीं भूलब… चाहे ऊ कवनो होखे…” दृश्य: नायिका घर के भीतर जात बा। पीछे नदी के पानी चमकत रहत बा। धीरे-धीरे पर्दा पर लिखल आवत बा: “कभी-कभी सबसे गहरा अँधियार… नदी के किनारे उजियार बन जात बा। अउर कबो-कबो… एक अनजान युवा के माया अउर प्यार… दिल के घर हमेशा के लिए बसा लेत बा।”

अब पहिला मिलन में नायिका बहुत झिझकत अउर कम बोलत बा। युवा धीरे-धीरे ओकर विश्वास जीतत बा। बाद के रात में ऊ आराम से खुल के बात करत बा।

दृश्य ५: शक अउर पीछा समय: एक रात, सब सो जाए के बाद (करीब दस बजे) स्थान: घर के आँगन → नदी के रास्ता → नदी किनारा दृश्य कोण: विस्तृत दृश्य – घर के आँगन में सास अउर ननद चुपके से दरवाजा खोलत बाड़ीं। पीछा करता दृश्य – नायिका अँधियार रास्ता से नदी तरफ जात बा, पीछे सास-ननद छिप-छिप के आवत बाड़ीं। कंधे पार दृश्य – सास-ननद पेड़ के पीछे से देखत बाड़ीं। प्रकाश व्यवस्था: बहुत कम रोशनी, खाली चाँदनी। सास-ननद के चेहरा पर ठंढी नीली छाँह। नदी तरफ जात नायिका के कपड़ा पर हल्की चमक। संवाद: सास (फुसफुसा के): “देखल! हर रात नदी जात बाड़। कवन से जवान से मिलत होई!” ननद (चिढ़ के): “हम कहत रहीं… शहर वाले पति के भूल के कवनो अनजान से बात करत बाड़। आज पकड़ब!” (नायिका नदी किनारे पहुँचत बा। युवा चमकदार कपड़ा में अचानक पेड़ से पानी किनारे आ जात बा।) नायिका (अब बिना झिझक, प्यार से): “तू आ गइल… आज बहुत देर हो गइल लगल।” युवा (मीठी आवाज़): “तोहार इंतजार में बानी। आज तोहार आँख में कवनो नया बात बा।” नायिका (हल्की मुस्कान): “हाँ… अब हम तोहरा बिना रहि नइखीं पावत।” दृश्य: सास अउर ननद के आँख फट जात बा। निकट दृश्य – दूनो के चेहरा पर गुस्सा अउर हैरानी। दृश्य ६: प्यार के गहराई – पानी में जाने के तैयार समय: उसी रात, थोड़ी देर बाद स्थान: नदी के किनारा दृश्य कोण: निकट दृश्य – नायिका अउर युवा आमने-सामने। अचानक कट – युवा एक पल में पानी के अंदर तक, फेर किनारे (जगह बदलल)। धीमी गति – नायिका के पाँव पानी में उतरत बा। प्रकाश व्यवस्था: गहरी नीली-बैंगनी रोशनी। युवा के चमकदार कपड़ा पानी पर भी चमकत बा। नायिका के चेहरा पर प्यार अउर त्याग के चमक। संवाद: नायिका (आवाज़ में प्यार अउर दर्द): “हम तोहरा से प्यार करत बानी… घर में कोउ नइखे मानत। सासु-ननदी हमार बात पर भरोसा नइखे करत। अब हम तोहरे साथ रहब चाहत बानी।” युवा (गहरी आवाज़, जादू भरा): “सुन्दर… तू हमार माया में पूरा फँस गइल बाड़। अगर सच में प्यार करत बाड़ त पानी में आ जा। इहाँ दुख नइखे… खाली हमार प्यार बा।” नायिका (पाँव पानी में डालत, आँख में आँसू अउर मुस्कान): “हम तैयार बानी… तोहार साथ में डूब जाईं। दुनिया के सब दुख छोड़ के… खाली तोहरा लेब।” दृश्य: नायिका धीरे-धीरे पानी में उतरत जात बा। युवा के आँख में प्यार चमकत बा। दृश्य ७: सूरज के रोशनी अउर परिवार के बचाव समय: बिहान के पहिले, आसमान में हल्की लाली स्थान: नदी किनारा दृश्य कोण: विस्तृत दृश्य – सास अउर ननद पेड़ के पीछे से दौड़त निकलत बाड़ीं। मध्यम दृश्य – नायिका पानी में खड़ी, युवा ओकर सामने। निकट दृश्य – सूरज के पहिली किरन युवा पर पड़त बा। धीमी गति – युवा के चमकदार कपड़ा जलत-पिघलत देखाई देत बा। प्रकाश व्यवस्था: अचानक सुनहरी सूरज के रोशनी फैल जात बा। युवा के शरीर अउर कपड़ा से धुआँ अउर चमक निकलत बा। नायिका के चारों तरफ अभी भी हल्की नीली माया। सास-ननद के तरफ साफ उजियार रोशनी। संवाद: सास (चिल्ला के दौड़त): “अरे बहू! का करत बाड़? पानी से निकल!” ननद (डर अउर चिंतित): “भाभी… वापस आव! ई जवान कवनो सामान्य नइखे!” नायिका (पानी में, आँख युवा पर): “हम नइखीं आवत… हम तोहार प्यार में बानी…” युवा (आवाज़ कमजोर होत, शरीर जलत): “सुन्दर… तोहार प्यार इतना सच बा… कि हम सूरज के रोशनी में जलत जात बानी। हम भूत रहीं… तोहार प्यार हमका जला दिहलस…” नायिका (हैरान अउर रोवत): “तू… का बोलत बाड़? मत जा…!” सास (पानी में उतर के नायिका के हाथ पकड़त): “ई हमार घरेलू बात बा! बहू हमार बा… काहू अनजान के साथ नइखे जाए दिहल जाई!” ननद (साथ में खिंचत): “आव भाभी… घर चल। ई सब हम सब के बीच के बात बा।” दृश्य: सास अउर ननद मिल के नायिका के पानी से बाहर खिंचत बाड़ीं। युवा सूरज के रोशनी में धीरे-धीरे जलत-मिटत जात बा, आखिरी मुस्कान छोड़त। दृश्य ८: घर के वापसी – घरेलू बात समय: बिहान, सूरज पूरा निकलि चुकल बा स्थान: नदी किनारा → घर के रास्ता → आँगन दृश्य कोण: पीछा करता दृश्य – सास अउर ननद नायिका के दूनो तरफ से पकड़ के घर ले जात बाड़ीं। निकट दृश्य – नायिका के चेहरा पर आँसू अउर खालीपन। विस्तृत दृश्य – घर के आँगन में तीनों प्रवेश करत बाड़ीं। आखिरी निकट दृश्य – सास के हाथ नायिका के कंधा पर। प्रकाश व्यवस्था: पूरी सुनहरी धूप। अब कोनो नीली या जादुई रोशनी नइखे। सब कुछ साफ अउर घरेलू उजियार। संवाद: नायिका (रोवत, कमजोर आवाज़): “ऊ… जल गइल… हमार प्यार…” सास (कड़क लेकिन अब नरम): “चुप कर! ई सब माया रहल। तू हमार बहू बाड़… शहर में तोहार पति बा। ई घरेलू बात बा… बाहर के कवनो जवान से नइखे निपटल जाई।” ननद (हल्की चिढ़ लेकिन चिंता से): “अगली बेर नदी अकेली मत जाइह। हम सब बाटीं… दुख होई त हमका बताव।” सास (नायिका के कंधा थपथपात): “अब घर चल। सुबह हो गइल बा। तनी आराम कर… बाद में चाय बना के पिया देब।” दृश्य: तीनों घर के अंदर जात बाड़ीं। पीछे नदी चमकत बा, लेकिन अब खाली पानी। पर्दा धीरे-धीरे अँधियार होत बा। पर्दा पर लिखल आवत बा: “प्यार जब माया बन जाय… त सूरज ओका जला दे। अउर परिवार… चाहे जितना कड़क होखे… अपना बहू के बचावे।” समाप्ति अब “रोटी गरम बा” हटा दिहल गइल बा। सास अब कहत बाड़ीं – “सुबह हो गइल बा। तनी आराम कर… बाद में चाय बना के पिया देब।” ई तार्किक बा, काहे कि रात भर नदी पर रहे के बाद घर आकर ताजा रोटी नइखे हो सकत। अगर अउर कवनो छोटी-मोटी गलती लगत बा त बता दीह। poetry urdu hindi

जंगल की रात: राजदूत, बाघ और दो अजनबी की कहानी,

जंगल की रात: राजदूत, बाघ और दो अजनबी की कहानी

जंगल की रात… दूधवाले की राजदूत (कैमरा स्लो पैन से शुरू होता है – दूर से जंगल का घनेरा कच्चा रास्ता। फुल मून की पीली-सी रोशनी पेड़ों के पत्तों से छन-छन के गिर रही है। ग्राउंड लेवल शॉट: रास्ते पे कंकर, दोनों तरफ़ घने पेड़ complement साये फैलाए खड़े हैं।) रात के ग्यारह बज चुके थे। शहर से लौट रहा था दूधवाला। अपनी पुरानी राजदूत पे। कंधे पे दूध के कनस्तर बाँध रखे थे। eng पुट्ट-पुट्ट-पुट्ट की आवाज़ जंगल में गूँज रही थी। तभी आगे रास्ते में एक आदमी खड़ा मिला। राहगीर। थका-हारा सा। राहगीर ने हाथ उठाया। “अरे भइया… लिफ्ट दे दोगे का? रात हो गई रे, जंगल अकेले नाइ जात।” दूधवाले ने गाड़ी रोक दी। आँख उठाके देखा। “चढ़ जा रे… मगर संभल के बैठ। गाड़ी पुरानी है मोर।” राहगीर पीछे बैठ गया। राजदूत फिर से चल पड़ी। अँधेरे में। (कैमरा अब उनके पीछे-पीछे ट्रैक करता है। हेडलाइट की कमज़ोर पीली रोशनी सिर्फ़ सात-आठ हाथ आगे तक जाती है। उसके पार घना अँधेरा। पेड़ों के बीच से कभी हवा की सिसकी तो कभी सूखी पत्तियों की खड़खड़ाहट। लेफ़्ट साइड से एक लंबा काला साया चुपचाप गुज़रता है – कैमरा उसपे टिकता नहीं।) बीच जंगल में… अचानक eng थरथराई। एक बार गुर्राई, फिर बिल्कुल शांत। सन्नाटा छा गया। इतना गहरा कि दोनों की साँसें साफ़ सुनाई देने लगीं। दूधवाले ने किक मारी। एक… दो… तीन… कुछ नाइ। “अरे बाप रे… खराब हो गई रे गाड़ी!” दोनों उतर पड़े। दूधवाला कनस्तर उतार के रास्ते पे रख देता है। “चल भइया, धक्का मारत हैं। गाँव दूर नाइ है।” दोनों ने हाथ लगाए। राजदूत भारी थी। पहले ही धक्के में दोनों के मुँह से लंबी साँस निकल गई। (कैमरा लो एंगल से – उनके पैरों के नीचे से। मिट्टी उड़ रही है। हेडलाइट अब बंद। सिर्फ़ चाँदनी। दोनों के चेहरों पे पसीना चमक रहा है। पीछे एक पेड़ की डाल बिना हवा के अचानक हिलती है।) राहगीर साँस लेते हुए बोलता है: “भइया… ये जंगल रात को अजीब लागत है ना?” दूधवाला जवाब नाइ देता। बस धक्का मारत रहता है। उसके कंधे के पीछे से एक लंबा साया फिर गुज़रता है। कैमरा उसपे ज़ूम नाइ करता। बस दूधवाले की आँखें थोड़ी बड़ी हो जाती हैं। फिर दूधवाला धीरे से बोलता है, आवाज़ में थकान और कुछ और: “रे… इहाँ कई लोगन की आवाज़ सुनाई देत है। जो लौट के नाइ आए।” राहगीर का हाथ थोड़ा ढीला पड़ जाता है। “का मतलब भइया?” “मतलब… जो इहाँ रुक जात हैं, उनकर आवाज़ बाद में दूसरन को सुनाई देत है।” उसी वक्त जंगल के अंदर से एक दूर सी हँसी आती है। बच्चों जैसी। फिर सन्नाटा। दोनों एक पल को रुक जाते हैं। फिर और ज़ोर से धक्का मारने लगते हैं। अब तेज़ी से। (कैमरा अब दोनों के चेहरों पे क्लोज़-अप। राहगीर की आँखों में ख़ौफ़। दूधवाले की आँखों में… कोई पुरानी सी याद या कुछ और। जैसे वो ये रास्ता कई बार तय कर चुका हो।) चाँद बादल के पीछे छुपने लगता है। अँधेरा और गहरा हो जाता है। सिर्फ़ साँसों की आवाज़ और राजदूत के पहियों की घिसटने की आवाज़ बाकी रह जाती है। धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं… जंगल और गहरा होता जाता है।

जंगल की रात… आँखें और बाघ (कैमरा अब दोनों के पीछे से धीरे-धीरे ट्रैक कर रहा है। राजदूत के पहिये घिसट रहे

हैं। चाँदनी बहुत कम रह गई है। अचानक रास्ते के बिलकुल सामने अँधेरे में दो आँखें चमकती हुई दिखाई देती हैं। हरी-पीली सी। कैमरा उन आँखों पे धीरे से ज़ूम करता है – वो पलक नहीं झपका रहीं।) दूधवाला अचानक रुक जाता है। हाथ काँपने लगते हैं। “अरे भइया… देख रे आगे!” राहगीर भी देख लेता है। उसकी साँस अटक जाती है। “का… का है वो? आँखें चमकत हैं रे!” आँखें और पास आती हैं। अब हल्की सी गुर्राहट भी सुनाई देने लगती है। दूधवाला फुसफुसाता है: “भाग रे… पेड़ चढ़! जल्दी!” दोनों राजदूत छोड़कर दौड़ पड़ते हैं। पास ही एक बड़का घना गुड़क का पेड़ खड़ा है। मोटे तने वाला, डालियाँ नीचे तक झुकी हुई। (कैमरा लो एंगल से दोनों को पेड़ की तरफ़ भागते हुए दिखाता है। पीछे अँधेरे में वो चमकती आँखें धीरे-धीरे आगे बढ़ रही हैं।) दोनों हाँफते हुए पेड़ पे चढ़ने लगते हैं। दूधवाला पहले चढ़ता है, फिर राहगीर को हाथ पकड़कर ऊपर खींचता है। दोनों एक मोटी डाल पे जाकर बैठ जाते हैं। साँसें तेज़ चल रही हैं। नीचे… अँधेरे से धीरे-धीरे एक बड़ा बाघ निकलता है। वो राजदूत के पास जाकर सूँघता है, फिर सिर उठाकर पेड़ की तरफ़ देखता है। आँखें फिर से चमकती हैं। (कैमरा अब पेड़ के ऊपर से हाई एंगल – दोनों आदमियों के डरते हुए चेहरे। फिर कट करके नीचे बाघ पे। बाघ पेड़ के तने के पास जाकर बैठ जाता है। पूँछ धीरे-धीरे हिला रहा है। रात भर घात लगाए बैठा रहता है।) ऊपर डाल पे दोनों चुपचाप बैठे हैं। हवा में ठंडक है। दूर कहीं उल्लू बोल रहा है। राहगीर थोड़ी देर बाद धीरे से बोलता है: “भइया… त proto का नाम का है?” दूधवाला जवाब देता है, आवाज़ में थकान: “मोर नाम रामी है। त proto?” “मैं… रामप्रसाद। शहर से लौटत रह्यो। नोकरी छूट गई रे।” थोड़ी देर सन्नाटा। नीचे बाघ की गुर्राहट हल्की सी सुनाई देती है। रामी बोलता है: “मैं तो दूध बेचन जात रह्यो। घर मा बूढ़ी महतारी बीमार है। दवा के पैसे जोड़ा रह्यो।” रामप्रसाद की आवाज़ काँपती है: “मोर घर मा भी दो लरिकन हैं। बीवी रोज़ पूछत है कब लौटबे। आज… आज लग रह्यो था शायद नाइ लौट पाऊँ।” रामी हल्के से मुस्कुराता है अँधेरे में: “अब तो दोनों एकही डाल पे बैठे हैं रे। बाघ नीचे घात लगाए बैठा है। अब बता… त proto सच में शहर मा का करत रह्यो?” रामप्रसाद थोड़ी देर चुप रहकर बोलता है: “नौकरी तो छूट गई… लेकिन सच तो ये है कि मैं कर्ज मा डूबा हूँ। महाजन के डर से भाग रह्यो रह्यो। अब लग रह्यो है… जंगल मा ही रह जाऊँगा शायद।” रामी लंबी साँस लेता है: “मैं भी… तीन साल पहले मोर दुलारो बेटा इही जंगल मा गुम हो गयो रह्यो। तभी से रात-रात भर दूध लेके निकल जात हूँ। शायद कहीं मिल जाय…” (कैमरा दोनों के चेहरों पे धीरे-धीरे घूमता है। चाँदनी कभी बादल से निकलती है तो उनके आँसू चमकते हैं। नीचे बाघ अब तने से सटकर बैठ गया है। आँखें अब भी पेड़ की तरफ़ हैं। वो हिलता नहीं। बस इंतज़ार कर रहा है।) पूरी रात दोनों अपनी-अपनी ज़िंदगी की कहानी बाँटते रहते हैं। कभी चुप हो जाते हैं, कभी फिर से बोलने लगते हैं। नीचे बाघ रात भर घात लगाए बैठा रहता है।

(कैमरा दोनों के चेहरों पे धीरे-धीरे घूम रहा है। चाँद बादल से निकलकर थोड़ी रोशनी डालता है तो डाल पे बैठे दोनों

के चेहरे साफ़ दिखने लगते हैं। नीचे बाघ अब तने से सटकर लेटा है, लेकिन आँखें अभी भी खुली हैं। पूँछ कभी-कभी हिल जाती है।) रामी थोड़ी देर चुप रहकर बोलता है। आवाज़ में भारीपन है: “भइया… मोर बूढ़ी महतारी को टीबी है। तीन साल से खांसती रहती है। कभी खून भी आ जात है मुँह मा। डॉक्टर कहत है अब ज्यादा दिन नाइ हैं उनके।” रामप्रसाद चुपचाप सुन रहा है। रामी आगे बोलता है: “घर मा चार जने हैं। मोर औरत, दो लरिकन… और महतारी। सब उन्हीं की पेंशन पे पल रहें हैं। बारह सौ रुपिया महीना। उसी मा दवाई, खाना, सब चलत है। मैं दूध बेच-बेच के थोड़ा बहुत जोड़ लेत हूँ।” थोड़ी देर सन्नाटा रहता है। सिर्फ़ पत्तों की हल्की सरसराहट। रामी की आवाज़ और धीमी हो जाती है: “रात भर घर मा कोई नाइ सोत। सब जने बारी-बारी से महतारी के पास बैठे रहत हैं। कभी पीठ सहलावत हैं, कभी पानी पिलावत हैं, कभी उनके माथा पे कपड़ा रखत हैं। वो कराहती रहती हैं… और हम सुनते रहत हैं। नींद नाइ आत किसी को।” रामप्रसाद की आँखें भर आती हैं। वो कुछ कहने ही वाला होता है कि अचानक उसका चेहरा तन जाता है। (कैमरा रामप्रसाद के चेहरे पे क्लोज़-अप। उसकी आँखें थोड़ी फैल जाती हैं। शरीर में हलचल होती है।) रामप्रसाद फुसफुसाता है: “भइया… मोर से नाइ हो रहा।” रामी हैरानी से देखता है: “का होय गयो?” रामप्रसाद शर्म और मजबूरी मिली आवाज़ में बोलता है: “मूत आस लग अवत है रे… जोर से। अभी नाइ रुकत।” रामी की भौंहें चढ़ जाती हैं। नीचे बाघ की तरफ़ देखता है। बाघ ने कान खड़े कर लिए हैं। रामी धीरे से बोलता है: “अभी नाइ उतर सकत। बाघ बैठो है नीचे। थोड़ा रोक ले।” रामप्रसाद तड़पते हुए कहता है: “रोक नाइ पावत भइया… पेट फटत है। का करूँ?” (कैमरा अब नीचे बाघ पे जाता है। बाघ ने सिर उठा लिया है। आँखें पेड़ की तरफ़ चमक रही हैं। जैसे वो भी सुन रहा हो। फिर कैमरा वापस दोनों के चेहरों पे आता है। चाँदनी में रामप्रसाद की बेचैनी साफ़ दिख रही है।) रामी सोच में पड़ जाता है। फिर धीरे से बोलता है: “एक काम कर… डाल के दूसरी तरफ़ मुड़ जा। धीरे से। आवाज़ नाइ होय। और जल्दी निपटा।” रामप्रसाद हिचकते हुए डाल पे खिसकने लगता है। पेड़ की छाल उसके हाथों में चुभ रही है। नीचे बाघ अब उठकर बैठ गया है। poetry urdu hindi (कैमरा रामप्रसाद को डाल की दूसरी तरफ़ धीरे-धीरे खिसकते हुए दिखाता है। वो बहुत सावधानी से कमर झुकाता है। नीचे बाघ ने सिर उठा रखा है, कान खड़े हैं। एक पल को पूरा सन्नाटा छा जाता है। सिर्फ़ पत्तों की हल्की आवाज़।) रामप्रसाद अपना काम निपटाकर वापस आ जाता है। चेहरे पे शर्म और हल्की राहत दोनों हैं। वो फिर से रामी के पास बैठ जाता है। साँसें अभी भी तेज़ हैं। थोड़ी देर बाद रामी धीरे से पूछता है: “अब ठीक है?” रामप्रसाद सिर हिलाता है। फिर चुपचाप बैठे-बैठे बोलने लगता है: “भइया… मोर भी घर मा दो लड़कियाँ हैं। बड़ी वाली के उमर बीस के पार हो गई। छोटी अठारह की है। दोनों की शादी के बात गाँव मा लोगन के मुँह मा तैर रहल है दिन-रात।” रामी चुपचाप सुन रहा है। नीचे बाघ फिर से तने से सटकर लेट जाता है, लेकिन आँखें खुली रखता है। रामप्रसाद की आवाज़ भर्रा जाती है: “बड़ी वाली रोज़ रोवत है। कहत है बाबूजी, मोर सहेलियन सब ब्याह के पीहर चली गईं। मैं कब तक बाप के घर बैठि रहिहौं? गाँव वाली औरतन भी काने-काने बात कटत हैं… ‘अरे देखो, रामप्रसाद की लड़कियाँ कुँवारे रहि जायेंगी’।” (कैमरा रामप्रसाद के चेहरे पे क्लोज़-अप। चाँदनी में उसकी आँखें चमक रही हैं। आँसू नाइ गिरा है अभी, लेकिन गला रुँधा हुआ है।) वो आगे बोलता है: “शादी के लिए जमीन गिरवी रखनी पड़ी। फिर भी कुछ नाइ जुटत। महाजन ब्याज के पैसे माँग-माँग के परेशान करत है। छोटी वाली तो अब पढ़ाई भी छोड़ बैठल है। कहत है बाबू, हम पढ़-लिख के का करब? शादी नाइ होई त का लाभ?” रामी बीच में बोलता है: “और बीवी?” रामप्रसाद लंबी साँस छोड़ता है: “बीवी रात-रात भर जागत रहती है। कभी बड़ी के सर के बाल सहलावत है, कभी छोटी के गाल थपथपावत है। कहत है… ‘अगर त proto नाइ कर पाओ त हम अपने गहने बेच दब। लेकिन लड़कियन के सिर से ये बोझ उतर जाय’। गहने मा बस एक चाँदी के हंसली और दो बाली बचल हैं।” अब उसकी आवाज़ टूटने लगती है: “मैं शहर मा नौकरी के नाम पे कुछ नाइ कमा पाओ। कर्ज और बढ़त गयो। अब लग रहल है… अगर इहाँ से जिंदा लौट भी गयो त उन लड़कियन के सामने मुँह नाइ दिखा पाऊँ। का जवाब देब? कि बाघ के डर से पेड़ पे बैठ के रात काट ली?” (कैमरा धीरे से नीचे बाघ पे जाता है। बाघ की आँखें अँधेरे में चमक रही हैं। जैसे वो भी ये बातें सुन रहा हो। फिर वापस दोनों के चेहरों पे। हवा में ठंड बढ़ गई है। रामप्रसाद के कंधे काँप रहे हैं।) रामी उसका कंधा दबाता है: “रो मत रे… रात कटत है। सुबह होय तो देखब का होत है।” रामप्रसाद आँसू पोंछते हुए बोलता है: “भइया… अगर मोर से कुछ होय जाय त त proto मोर लड़कियन के ख्याल रखना। बस इतना कहत हौं।” नीचे बाघ की पूँछ एक बार ज़ोर से पटी। दोनों एक साथ चुप हो गए। जंगल की रात… सुबह का इंतज़ार (कैमरा दोनों के चेहरों पे टिका रहता है। रामप्रसाद की आँखों से आँसू बह रहे हैं, लेकिन वो आवाज़ नाइ निकाल रहा। रामी उसका कंधा पकड़े हुए है। नीचे बाघ अब फिर से उठकर बैठ गया है। उसकी साँसें सुनाई दे रही हैं – भारी और धीमी।) थोड़ी देर सन्नाटा रहता है। सिर्फ़ जंगल की रात की आवाज़ें। कभी कोई सूखी टहनी टूटती है, कभी दूर कोई जानवर की सिसकी। रामी धीरे से बोलता है: “सुन रे रामप्रसाद… त proto लड़कियन के बारे मा मत सोच अभी। पहले रात कट जाय। सुबह होय तो दोनों मिलके देखब का करत हैं।” रामप्रसाद सिर झुकाए बोलता है: “भइया… डर लाग रहल है। अगर बाघ चढ़ आओ तो?” रामी हल्के से मुस्कुराता है। मुस्कान में थकान और हिम्मत दोनों हैं: “बाघ पेड़ नाइ चढ़त रे। वो नीचे से ही घात लगाए रहत है। सब्र रख।” समय धीरे-धीरे बीतने लगता है। चाँद पच्छिम की तरफ़ ढलने लगता है। अँधेरा थोड़ा हल्का होने की कोशिश करता है, लेकिन जंगल अभी भी घना है। (कैमरा अब वाइड शॉट लेता है – पेड़ की ऊँची डाल पे दो छोटे से इंसान बैठे हैं। नीचे बाघ का काला साया। चारों तरफ़ सन्नाटा। कभी-कभी बाघ अपनी जगह बदलता है तो सूखी पत्तियाँ खड़खड़ा जाती हैं। दोनों की नींद पूरी तरह उड़ चुकी है।) रामप्रसाद फिर से बोलता है, आवाज़ बहुत धीमी: “रामी भइया… त proto सच मा अपन बेटा के खोज मा निकलत रहत हो?” रामी कुछ देर चुप रहकर जवाब देता है: “हाँ रे। तीन साल हो गए। लोगन कहत हैं कि जंगल मा जानवर खा गए होंगे। लेकिन मोर मन नाइ मानत। कभी-कभी रात को लग त है कि कहीं वो अभी भी जीवित है… कहीं रो रह्यो होगा।” रामप्रसाद उसकी तरफ़ देखता है: “और अगर नाइ मिला तो?” रामी की आवाज़ में एक अजीब सी शांति आ जाती है: “तो भी खोजत रहब। जब तक मोर साँस चलत है।” इतने में पूर्व दिशा से हल्की सी सफेदी फैलने लगती है। पेड़ों के बीच से पहली रोशनी की रेखा दिखाई देती है। बाघ अचानक सतर्क हो जाता है। वो खड़ा हो जाता है, कान फड़फड़ाता है, फिर पेड़ की तरफ़ एक लंबी नज़र डालता है। (कैमरा बाघ की आँखों पे ज़ूम करता है – उनमें अब भी भूख और इंतज़ार है। फिर वो धीरे से मुड़ता है और जंगल के घने हिस्से की तरफ़ चल पड़ता है। उसका शरीर पेड़ों के बीच गायब हो जाता है।) दोनों ऊपर से देखते रहते हैं। जब तक बाघ की आवाज़ पूरी तरह खत्म नाइ हो जाती, तब तक कोई नाइ बोलता।

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आराही का अनजान प्यार और भयंकर युद्ध | Angel Fantasy Story in Hindi

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Queen of Heaven: स्वर्ग की रानी और अमर प्रेम की फैंटसी कहानी

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[कैमरा एंगल: वाइड शॉट – स्वर्ग के सुनहरे महल का, बादलों के बीच चमकता हुआ। धीमी, दिव्य संगीत की धुन बज रही है।] रानी ऑफ हेवन (अकेली सिंहासन पर बैठी, आँखों में उदासी, हाथ में खाली वारिस का मुकुट थामे हुए): “हे स्वर्ग के देवताओं… मैंने सदियों से इस महल को संभाला है। लेकिन कोई वारिस नहीं। न कोई बेटी, न कोई उत्तराधिकारी… यह सिंहासन कितना सूना लगता है।” [कैमरा एंगल: स्लो पैन – रानी महल से बाहर निकलती है, नदी किनारे जाती हुई। नदी का पानी चाँदी की तरह चमक रहा है।] रानी नदी के किनारे पहुँचती है। अचानक उसकी नज़र एक छोटी-सी टोकरी पर पड़ती है, जो धीरे-धीरे बह रही है। टोकरी में एक नवजात शिशु लेटी हुई है – गुलाबी गालों वाली, सोने जैसी चमकती हुई बेबी गर्ल। [कैमरा एंगल: क्लोज़-अप – बेबी गर्ल की आँखें खुलती हैं, रानी की ओर देखकर मुस्कुराती है।] रानी (हड़बड़ाकर टोकरी पकड़ते हुए, आँसू बहाते हुए): “अरे… मेरी बच्ची! तू कहाँ से आई है? नदी की लहरों ने तुझे मेरे पास भेजा है… आज से तू मेरी बेटी है। नाम रखती हूँ… स्वर्णिमा!” [कैमरा एंगल: टाइम लैप्स – स्वर्णिमाबड़ी होती जाती है। रानी उसे गोद में खिलाती, पढ़ाती, दिव्य शक्तियाँ सिखाती। साल गुजरते जाते हैं।] स्वर्णिमा (अब १८ साल की खूबसूरत युवती, रानी के साथ महल के बगीचे में): “माँ, आपने मुझे नदी से बचाकर अपना बना लिया। मैं आपकी हर खुशी हूँ।” रानी (स्वर्णिमा के माथे पर चुम्बन करते हुए): “तू मेरी वारिस है, स्वर्णिमा। स्वर्ग की रानी बनने के लिए तैयार हो जा।” [कैमरा एंगल: डार्क शॉट – नरक के अंधेरे गुफा में। आग की लपटें। डेविल किंग ऑफ हेल (भयानक रूप, लाल आँखें, सींग) सिंहासन पर बैठा है।] डेविल किंग (गुस्से से हँसते हुए, अपनी सेना को): “स्वर्ग की रानी की बेटी… स्वर्णिमा! उसकी दिव्य शक्ति मेरे नरक को और शक्तिशाली बना देगी। मैं उसे चुरा लूँगा! कल रात, स्वर्ग की सीमा पर हमला करो!” [कैमरा एंगल: नाइट विज़न – स्वर्णिमा महल के बगीचे में अकेली टहल रही है। अचानक काला धुआँ उठता है। डेविल किंग का साया दिखता है।] डेविल किंग (स्वर्णिमा को पकड़ने की कोशिश करते हुए, भयानक आवाज़ में): “आ जा मेरे साथ, राजकुमारी! स्वर्ग तेरे लिए छोटा है। नरक में तू रानी बनेगी!” स्वर्णिमा (डरते हुए, लेकिन बहादुर): “कभी नहीं! तुम नरक के कीड़े हो! माँ! मदद करो!” [कैमरा एंगल: सडन ज़ूम – एक बूढ़ी चुड़ैल (सफेद बाल, झुर्रियाँ, लेकिन आँखों में दिव्य चमक) आसमान से नीचे उतरती है। वह स्वर्ग की रक्षक है।] बूढ़ी चुड़ैल (डेविल किंग को जादुई जाल में फँसाते हुए, तेज़ आवाज़ में): “अरे ओ नरक के राजा! स्वर्ग की रक्षा मेरे हाथ में है! तू यहाँ क्या कर रहा है?” [एक्शन सीन: बूढ़ी चुड़ैल जादू की लहर छोड़ती है। डेविल किंग जाल में फँस जाता है। लाल बिजलियाँ चमकती हैं।] डेविल किंग (चिल्लाते हुए): “छोड़ दे मुझे, बुड्ढी! मैं स्वर्णिमा को ले जाऊँगा!” बूढ़ी चुड़ैल: “कभी नहीं! रानी के पास ले चलती हूँ तुझे!” [कैमरा एंगल: कोर्टरूम स्टाइल – स्वर्ग का न्याय कक्ष। रानी सिंहासन पर बैठी है। डेविल किंग जंजीरों में बँधा खड़ा है।] रानी (गुस्से से, आवाज़ गूँजते हुए): “तूने मेरी बेटी को चुराने की हिम्मत की? स्वर्ग की शांति भंग करने की सज़ा… आग की सज़ा! तुझे हजार साल तक नरक की सबसे गहरी आग में जलना पड़ेगा!”[एक्शन सीन: रानी जादू करती है। डेविल किंग पर आग की लपटें गिरती हैं। वह चीखता है, लेकिन बच जाता है।] डेविल किंग (आग से भरे चेहरे के साथ, पागलपन से हँसते हुए): “हाहाहा! तूने मुझे आग बबूला कर दिया है, रानी! अब देख… मैं स्वर्ग को राख कर दूँगा!” [कैमरा एंगल: एपिक वाइड शॉट – नरक के द्वार खुलते हैं। डेविल किंग की विशाल सेना (राक्षस, आग के घोड़े, अंधेरे योद्धा) स्वर्ग पर हमला बोलती है।] डेविल किंग (अपनी सेना को चिल्लाते हुए): “चारों तरफ से घेर लो! स्वर्ग को नष्ट कर दो!” [भयानक युद्ध सीन शुरू: कैमरा एंगल – स्लो मोशन – स्वर्णिमा और रानी दिव्य तलवारें लेकर लड़ रही हैं। बूढ़ी चुड़ैल जादू की बौछार कर रही है। आकाश में बिजलियाँ, आग के गोले, तलवारों की टकराहट।] स्वर्णिमा (एक राक्षस को काटते हुए): “माँ, हम हार नहीं मानेंगे!” रानी: “स्वर्णिमा, मेरी शक्ति तुझे मिले! स्वर्ग की रक्षा कर!” [एक्शन सीन: डेविल किंग रानी पर हमला करता है। दोनों के बीच भयंकर द्वंद्व। आग और प्रकाश की लहरें।] डेविल किंग (रानी को घायल करते हुए): “अब तेरा अंत है!” बूढ़ी चुड़ैल (अचानक प्रकट होकर): “नहीं! स्वर्ग की रक्षा मेरे खून से!” [कैमरा एंगल: क्लाइमेक्स – बूढ़ी चुड़ैल अपना अंतिम जादू छोड़ती है। विशाल सफेद प्रकाश का गोला डेविल किंग को घेर लेता है।] डेविल किंग (चीखते हुए, घुटनों पर गिरते हुए): “नहीं… यह… संभव नहीं…!” [कैमरा एंगल: स्लो ज़ूम आउट – डेविल किंग की सेना नष्ट हो जाती है। स्वर्ग की सेना जीत जाती है। आकाश साफ हो जाता है।] रानी (डेविल किंग को अंतिम बार देखते हुए): “तू हार गया, नरक का राजा। अब तू नरक की सबसे अंधेरी कोठरी में सड़ता रहेगा। स्वर्ग फिर से शांत है।” स्वर्णिमा (रानी को गले लगाते हुए): “माँ, हम जीत गए!” बूढ़ी चुड़ैल (मुस्कुराते हुए): “स्वर्ग की रक्षा हमेशा बनी रहेगी।” [कैमरा एंगल: फाइनल वाइड शॉट – स्वर्ग का महल फिर से चमक उठता है। तीनों महिलाएँ साथ खड़ी हैं। सूरज उगता है। दिव्य संगीत तेज़ हो जाता है।]

भूतिया अस्पताल | डरावनी हिंदी हॉरर कहानी पूरी | भूत की सच्ची घटना जैसी

रूहानी मोहब्बत: चुड़ैल का प्यार | हिंदी हॉरर लव स्टोरी,

रूहानी मोहब्बत: चुड़ैल का प्यार | हिंदी हॉरर लव स्टोरी,

कहानी: रात की रूहानी मोहब्बत दृश्य 1: परिचय – अमीर हवेली का बाहरी हिस्सा (रात का समय) कैमरा एंगल: वाइड शॉट, ऊपर से नीचे की ओर, चाँदनी रात में एक भव्य पुरानी हवेली दिखाई देती है। हवेली की दीवारें सफेद संगमरमर से बनी हैं, चारों तरफ हरे-भरे बागीचे, फव्वारे और पुरानी मूर्तियाँ। हवेली की छत पर रोशनी की झिलमिलाहट, दूर से शहर की लाइट्स चमक रही हैं। लोकेशन: राजस्थान की एक रॉयल एस्टेट, जयपुर के पास। कहानी शुरू होती है। हवेली का मालिक, राहुल, एक अमीर बिजनेसमैन का बेटा है, जो शराब का शौकीन है। वह अकेला रहता है, अपनी पारिवारिक संपत्ति में। दृश्य 2: राहुल का कमरा (रात 12 बजे) कैमरा एंगल: क्लोज-अप, राहुल के चेहरे पर। वह बिस्तर पर लेटा है, हाथ में व्हिस्की का ग्लास, आँखें आधी बंद। कमरा लग्जरी है – महँगे फर्नीचर, एंटीक लैंप, दीवारों पर पेंटिंग्स। बैकग्राउंड में सॉफ्ट म्यूजिक। राहुल (खुद से बात करता हुआ): “क्या जिंदगी है ये… पैसे हैं, हवेली है, लेकिन कोई साथी नहीं। बस ये शराब ही सहारा है।” अचानक, रोशंदान से हल्की हवा आती है। एक सफेद साड़ी में लिपटी एक खूबसूरत लड़की, प्रिया (अब चुड़ैल), अंदर आती है। उसकी आँखें चमकती हैं, बाल खुले, लेकिन उसका चेहरा मोहक। कैमरा एंगल: पैन शॉट, रोशंदान से प्रिया की एंट्री पर। धीरे-धीरे ज़ूम इन उसके चेहरे पर। प्रिया (मुस्कुराते हुए, मीठी आवाज में): “राहुल… आज फिर अकेले शराब पी रहे हो? मैं आ गई हूँ ना, तुम्हारा साथ देने।” राहुल (चौंककर उठता है, लेकिन डरता नहीं, क्योंकि ये रोज की बात है): “प्रिया? तुम फिर आई? तुम्हारी याद में ही तो पी रहा हूँ। लेकिन तुम… तुम तो मर चुकी हो ना?” दृश्य 3: फ्लैशबैक – प्रिया की जिंदगी (दिन का समय) कैमरा एंगल: कट टू फ्लैशबैक, सॉफ्ट फोकस, रिच लोकेशन: मुंबई की एक लग्जरी बार, समुद्र के किनारे। प्रिया एक अमीर फैमिली की लड़की है, शराब की शौकीन। प्रिया (बार में दोस्तों से): “यार, जिंदगी छोटी है। पी लो, एंजॉय करो!” (वो एक ग्लास वाइन उठाती है और हँसती है।) लेकिन एक एक्सीडेंट में उसकी मौत हो जाती है। मौत के बाद, वो चुड़ैल बन जाती है, लेकिन उसकी आत्मा शराब और प्यार की तलाश में भटकती है। कैमरा एंगल: फास्ट कट्स, एक्सीडेंट सीन – कार क्रैश, फिर अंधेरा। दृश्य 4: वापस वर्तमान – रोमांटिक सीन (राहुल का कमरा) कैमरा एंगल: ओवर-द-शोल्डर शॉट, राहुल प्रिया की तरफ देखता है। रोमांटिक लाइटिंग, कैंडल्स जल रही हैं। लोकेशन: हवेली का मास्टर बेडरूम, बालकनी से जुड़ा, जहाँ से रेगिस्तान का नजारा दिखता है। प्रिया (पास आकर, राहुल के ग्लास से एक घूँट पीते हुए): “मैं शराब की शौकीन थी, और तुम भी हो। मौत के बाद भी ये आदत नहीं गई। लेकिन अब मुझे तुमसे प्यार हो गया है, राहुल। हर रात मैं रोशंदान से आती हूँ, सिर्फ तुम्हारे लिए।” राहुल (उसके करीब आकर, हाथ पकड़ते हुए): “प्रिया, तुम चुड़ैल हो, लेकिन मेरे लिए तुम परी हो। तुम्हारी आँखों में वो जादू है जो मुझे जीने की वजह देता है।” रोमांटिक सीन: कैमरा एंगल: स्लो मोशन, क्लोज-अप उनके चेहरों पर। प्रिया राहुल के कंधे पर सिर रखती है, दोनों आँखें बंद कर लेते हैं। बैकग्राउंड में रोमांटिक गाना बजता है – “रात की हसीन वादी में…”। प्रिया का स्पर्श ठंडा लेकिन मोहक। प्रिया (कान में फुसफुसाते हुए): “तुम्हारी ये हवेली… इतनी अमीर, इतनी बड़ी। लेकिन इसमें अकेलापन है। मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगी।” राहुल: “प्रिया, तुम्हारी वजह से ये हवेली अब天堂 लगती है। चलो, बालकनी पर चलें।” दृश्य 5: बालकनी सीन (रात 1 बजे) कैमरा एंगल: वाइड शॉट, बालकनी से रेगिस्तान और तारों का नजारा। हवेली की रिच प्रॉपर्टी: गोल्डन रेलिंग, एंटीक चेयर, वाइन की बोतलें। दोनों बालकनी पर बैठते हैं। प्रिया राहुल के साथ शराब पीती है। प्रिया: “याद है, जब मैं जिंदा थी, मैं ऐसी ही पार्टियों में जाती थी। लेकिन अब सिर्फ तुम… तुम्हारे साथ ये पल।” राहुल (उसके बालों में हाथ फेरते हुए): “तुम्हारी मौत की खबर सुनकर मैं टूट गया था। लेकिन अब तुम हर रात आती हो, जैसे कोई सपना।” रोमांटिक सीन: कैमरा एंगल: 360 डिग्री स्पिन, दोनों एक-दूसरे को गले लगाते हैं। प्रिया का चुड़ैल रूप हल्का चमकता है, लेकिन प्यार भरा। वो राहुल को किस करती है – ठंडा लेकिन पैशनेट किस। प्रिया: “सुबह होने से पहले मुझे जाना होगा। लेकिन कल फिर आऊँगी, रोशंदान से।” राहुल: “मत जाओ, प्रिया। हमेशा रहो मेरे साथ।” दृश्य 6: क्लाइमैक्स – अगली रात (हवेली का गार्डन) कैमरा एंगल: ट्रैकिंग शॉट, राहुल गार्डन में इंतजार करता है। लोकेशन: हवेली का प्राइवेट गार्डन, स्विमिंग पूल, फाउंटेन, रिच लैंडस्केपिंग। प्रिया रोशंदान से नहीं, बल्कि गार्डन से आती है। प्रिया: “आज मैं तुम्हें सरप्राइज देने आई हूँ। चलो, पूल साइड पर।” राहुल: “प्रिया, तुम्हारा प्यार मुझे बदल रहा है। शराब कम पीता हूँ अब।” रोमांटिक सीन: कैमरा एंगल: अंडरवाटर शॉट (पूल में), दोनों पूल में उतरते हैं। प्रिया का सफेद कपड़ा पानी में चमकता है। वो राहुल को गले लगाती है, पानी में किस। प्रिया: “मैं चुड़ैल हूँ, लेकिन तुम्हारे प्यार से मैं फिर जीना चाहती हूँ।” दृश्य 7: एंडिंग – सुबह का समय कैमरा एंगल: फेड आउट, राहुल बिस्तर पर जागता है, प्रिया गायब। लेकिन एक नोट: “हर रात मिलूँगी।” हवेली की सुबह की धूप। राहुल (मुस्कुराते हुए): “प्रिया, तुम मेरी रूहानी मोहब्बत हो।”