ज़मीन का बंदरबाट a short story ,

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ज़मीन का बंदरबाट a short story ,
ज़मीन का बंदरबाट a short story ,

ज़मीन का बंदरबाट a short story ,

ज़मीन का बंदरबाट a short story ,ये कहानी एक ऐसे बेख़ौफ़ बेपरवाह अलबेले व्यक्ति की है जिसने कभी ज़माने में

कभी किसी की बखत नहीं की मगर वक़्त ने उसे उस देहलीज़ पर ला पटका की उसे परिस्थितियों के सामने झुकना ही

पड़ा । साँझा चूल्हा में हमने राघव के छोटे भाई का ज़िक्र किया था , जिसका नाम जगनारायण था , ये कहानी उसी

किरदार के इर्द गिर्द घूमती है , तीनो भाइयों का हिस्सा बाँट हो चुका था जगनारायण के तीन बेटे और दो बेटियां थी , घर

के कीमती बर्तन जेवर सब भुखमरी और गरीबी के चलते बिक चुका था , जगनारायण के बच्चे बड़े हो चुके थे , तीनो

लड़के बनीमजूरी करके अपना जीवन यापन कर रहे थे , जगनारायण को अपनी बेटियों की चिंता रात दिन खाये जा रही

थी , अब जो खानदानी ज़मीन थी वो बेचने के अलावा कोई रास्ता नहीं था बेचारे के पास आखिरकार हारे दांव

यगनारायण को एक खेत बेचना पड़ गया और बड़ी बेटी का हाथ पीला कर दिया बेटी ज़्यादा पढ़ी लिखी तो थी नहीं उसके

हिसाब से लड़का ठीक ठाक मिल गया था फैक्ट्री में प्राइवेट नौकरी करता था ,

 

जगनारायण ने अब तीनो बेटों की भी शादी कर डाली थी , जगनारायण कहीं सारी ज़मीन न बेंच दे इसके चलते तीनो बेटों

में भी हिस्सा बाँट हो चुका था , कल को कोई लड़का जगनारायण की छोटी बेटी की शादी में ज़मीन बेचने में अड़ंगा न

लगाए इसके लिए एक खेत जगनारायण ने अपने नाम रख छोड़ा था , आखिर कार छोटी बेटी की शादी के लिए भी

जगनारायण को ज़मीन का वो टुकड़ा बेचना पड़ गया । अब चुकी जगनारायण  के पास ज़्यादा पैसे तो थे नहीं उसके

चलते लड़का भी बेरोज़गार ही मिला शिक्षा दीक्षा भी पौने आठ थी , हो गया किसी तरह से लइया पट्टी बेच कर वो अपना

घर चलाता था ,

 

छोटी बेटी की चिंता जगनारायण और उसकी पत्नी को दिन रात खाये जा रही थी , लड़कों के हिस्सा बाँट के बाद माँ बाप

का भी हिस्सा बाँट हो चुका था माँ मझले बेटे के हिस्से में गयी और बाप सबसे छोटे बेटे के हिस्से में , जगनारायण

जीभ का थोड़ा चटोरा था इसी के चलते जब कभी जगनारायण की पत्नी कुछ अच्छा खाना चुपके से लाके दे देती तो

मझली वाली बहू चिल्लाती कुड़कुड़ाती उस पर , इसी तरह से बुढ़ापा काट रहे थे दोनों , आँख की मोतिया बिन्द का

ऑपरेशन दोनों का हो चुका था , गाँव में सौंच क्रिया के लिए बाहर ही जाना पड़ता था , इसी के चलते बुढ़िया बेचारी कई

बार अँधेरे में घर का रास्ता नहीं ढूढ़ पाती थी और कड़कड़ाती ठण्ड बारिश के मौसम में बाहर ही किसी पेड़ की छाँव में

गुज़ार देती थी ।

bhoot ki kahani 

मौसम की मार बुढ़ापा भुखमरी के चलते ज़र्ज़र बुढ़िया ज़्यादा दिनों तक नहीं जी पाई और उसका स्वर्गवास हो गया ,

अपने दुःख सुख के साथी पत्नी की मौत का सदमा जगनारायण भी ज़्यादा दिनों तक नहीं सह पाए उनकी भी मौत हो

गयी , चूकी पत्नी के क्रिया करम में बड़े बेटे के बड़े बेटे ने ज़्यादा रुपया लगाया था , फिर कहीं रूपया न लगाना पड़ जाए

इसलिए वो जगनारायण के क्रिया करम में नहीं आया , तीनो लड़को ने मिलकर जगनारायण का क्रिया करम किया ,

बची खुची ज़मीन भी जगनारायण के तीनो बेटों की बेटियों की शादी में बिक गयी , अब रोज़ कमाना खाना उनकी

ज़िन्दगी का एक मात्र उद्देश्य था , जगनारायण की छोटी बेटी को ब्रैस्ट कैंसर हो गया है वो एक ऑपरेशन के बाद भी

ज़िन्दगी और मौत के बीच संघर्ष कर रही है , उसके भी दो लड़की एक लड़का है , जाने क्या होगा उसकी मौत के बाद उन

बच्चों का रामजाने

pix taken by google