जंगल की रात: राजदूत, बाघ और दो अजनबी की कहानी,

शहर से लौटते दूधवाले की राजदूत जंगल में खराब हो जाती है। एक राहगीर के साथ रात भर पेड़ पर बिताते हैं, नीचे बाघ घात लगाए बैठा रहता है। बुंदेलखंडी में लिखी भावुक और डरावनी कहानी।

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जंगल की रात: राजदूत, बाघ और दो अजनबी की कहानी
जंगल की रात: राजदूत, बाघ और दो अजनबी की कहानी

जंगल की रात: राजदूत, बाघ और दो अजनबी की कहानी

जंगल की रात… दूधवाले की राजदूत (कैमरा स्लो पैन से शुरू होता है – दूर से जंगल का घनेरा कच्चा रास्ता। फुल मून की पीली-सी रोशनी पेड़ों के पत्तों से छन-छन के गिर रही है। ग्राउंड लेवल शॉट: रास्ते पे कंकर, दोनों तरफ़ घने पेड़ complement साये फैलाए खड़े हैं।) रात के ग्यारह बज चुके थे। शहर से लौट रहा था दूधवाला। अपनी पुरानी राजदूत पे। कंधे पे दूध के कनस्तर बाँध रखे थे। eng पुट्ट-पुट्ट-पुट्ट की आवाज़ जंगल में गूँज रही थी। तभी आगे रास्ते में एक आदमी खड़ा मिला। राहगीर। थका-हारा सा। राहगीर ने हाथ उठाया। “अरे भइया… लिफ्ट दे दोगे का? रात हो गई रे, जंगल अकेले नाइ जात।” दूधवाले ने गाड़ी रोक दी। आँख उठाके देखा। “चढ़ जा रे… मगर संभल के बैठ। गाड़ी पुरानी है मोर।” राहगीर पीछे बैठ गया। राजदूत फिर से चल पड़ी। अँधेरे में। (कैमरा अब उनके पीछे-पीछे ट्रैक करता है। हेडलाइट की कमज़ोर पीली रोशनी सिर्फ़ सात-आठ हाथ आगे तक जाती है। उसके पार घना अँधेरा। पेड़ों के बीच से कभी हवा की सिसकी तो कभी सूखी पत्तियों की खड़खड़ाहट। लेफ़्ट साइड से एक लंबा काला साया चुपचाप गुज़रता है – कैमरा उसपे टिकता नहीं।) बीच जंगल में… अचानक eng थरथराई। एक बार गुर्राई, फिर बिल्कुल शांत। सन्नाटा छा गया। इतना गहरा कि दोनों की साँसें साफ़ सुनाई देने लगीं। दूधवाले ने किक मारी। एक… दो… तीन… कुछ नाइ। “अरे बाप रे… खराब हो गई रे गाड़ी!” दोनों उतर पड़े। दूधवाला कनस्तर उतार के रास्ते पे रख देता है। “चल भइया, धक्का मारत हैं। गाँव दूर नाइ है।” दोनों ने हाथ लगाए। राजदूत भारी थी। पहले ही धक्के में दोनों के मुँह से लंबी साँस निकल गई। (कैमरा लो एंगल से – उनके पैरों के नीचे से। मिट्टी उड़ रही है। हेडलाइट अब बंद। सिर्फ़ चाँदनी। दोनों के चेहरों पे पसीना चमक रहा है। पीछे एक पेड़ की डाल बिना हवा के अचानक हिलती है।) राहगीर साँस लेते हुए बोलता है: “भइया… ये जंगल रात को अजीब लागत है ना?” दूधवाला जवाब नाइ देता। बस धक्का मारत रहता है। उसके कंधे के पीछे से एक लंबा साया फिर गुज़रता है। कैमरा उसपे ज़ूम नाइ करता। बस दूधवाले की आँखें थोड़ी बड़ी हो जाती हैं। फिर दूधवाला धीरे से बोलता है, आवाज़ में थकान और कुछ और: “रे… इहाँ कई लोगन की आवाज़ सुनाई देत है। जो लौट के नाइ आए।” राहगीर का हाथ थोड़ा ढीला पड़ जाता है। “का मतलब भइया?” “मतलब… जो इहाँ रुक जात हैं, उनकर आवाज़ बाद में दूसरन को सुनाई देत है।” उसी वक्त जंगल के अंदर से एक दूर सी हँसी आती है। बच्चों जैसी। फिर सन्नाटा। दोनों एक पल को रुक जाते हैं। फिर और ज़ोर से धक्का मारने लगते हैं। अब तेज़ी से। (कैमरा अब दोनों के चेहरों पे क्लोज़-अप। राहगीर की आँखों में ख़ौफ़। दूधवाले की आँखों में… कोई पुरानी सी याद या कुछ और। जैसे वो ये रास्ता कई बार तय कर चुका हो।) चाँद बादल के पीछे छुपने लगता है। अँधेरा और गहरा हो जाता है। सिर्फ़ साँसों की आवाज़ और राजदूत के पहियों की घिसटने की आवाज़ बाकी रह जाती है। धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं… जंगल और गहरा होता जाता है।

जंगल की रात… आँखें और बाघ (कैमरा अब दोनों के पीछे से धीरे-धीरे ट्रैक कर रहा है। राजदूत के पहिये घिसट रहे

हैं। चाँदनी बहुत कम रह गई है। अचानक रास्ते के बिलकुल सामने अँधेरे में दो आँखें चमकती हुई दिखाई देती हैं। हरी-पीली सी। कैमरा उन आँखों पे धीरे से ज़ूम करता है – वो पलक नहीं झपका रहीं।) दूधवाला अचानक रुक जाता है। हाथ काँपने लगते हैं। “अरे भइया… देख रे आगे!” राहगीर भी देख लेता है। उसकी साँस अटक जाती है। “का… का है वो? आँखें चमकत हैं रे!” आँखें और पास आती हैं। अब हल्की सी गुर्राहट भी सुनाई देने लगती है। दूधवाला फुसफुसाता है: “भाग रे… पेड़ चढ़! जल्दी!” दोनों राजदूत छोड़कर दौड़ पड़ते हैं। पास ही एक बड़का घना गुड़क का पेड़ खड़ा है। मोटे तने वाला, डालियाँ नीचे तक झुकी हुई। (कैमरा लो एंगल से दोनों को पेड़ की तरफ़ भागते हुए दिखाता है। पीछे अँधेरे में वो चमकती आँखें धीरे-धीरे आगे बढ़ रही हैं।) दोनों हाँफते हुए पेड़ पे चढ़ने लगते हैं। दूधवाला पहले चढ़ता है, फिर राहगीर को हाथ पकड़कर ऊपर खींचता है। दोनों एक मोटी डाल पे जाकर बैठ जाते हैं। साँसें तेज़ चल रही हैं। नीचे… अँधेरे से धीरे-धीरे एक बड़ा बाघ निकलता है। वो राजदूत के पास जाकर सूँघता है, फिर सिर उठाकर पेड़ की तरफ़ देखता है। आँखें फिर से चमकती हैं। (कैमरा अब पेड़ के ऊपर से हाई एंगल – दोनों आदमियों के डरते हुए चेहरे। फिर कट करके नीचे बाघ पे। बाघ पेड़ के तने के पास जाकर बैठ जाता है। पूँछ धीरे-धीरे हिला रहा है। रात भर घात लगाए बैठा रहता है।) ऊपर डाल पे दोनों चुपचाप बैठे हैं। हवा में ठंडक है। दूर कहीं उल्लू बोल रहा है। राहगीर थोड़ी देर बाद धीरे से बोलता है: “भइया… त proto का नाम का है?” दूधवाला जवाब देता है, आवाज़ में थकान: “मोर नाम रामी है। त proto?” “मैं… रामप्रसाद। शहर से लौटत रह्यो। नोकरी छूट गई रे।” थोड़ी देर सन्नाटा। नीचे बाघ की गुर्राहट हल्की सी सुनाई देती है। रामी बोलता है: “मैं तो दूध बेचन जात रह्यो। घर मा बूढ़ी महतारी बीमार है। दवा के पैसे जोड़ा रह्यो।” रामप्रसाद की आवाज़ काँपती है: “मोर घर मा भी दो लरिकन हैं। बीवी रोज़ पूछत है कब लौटबे। आज… आज लग रह्यो था शायद नाइ लौट पाऊँ।” रामी हल्के से मुस्कुराता है अँधेरे में: “अब तो दोनों एकही डाल पे बैठे हैं रे। बाघ नीचे घात लगाए बैठा है। अब बता… त proto सच में शहर मा का करत रह्यो?” रामप्रसाद थोड़ी देर चुप रहकर बोलता है: “नौकरी तो छूट गई… लेकिन सच तो ये है कि मैं कर्ज मा डूबा हूँ। महाजन के डर से भाग रह्यो रह्यो। अब लग रह्यो है… जंगल मा ही रह जाऊँगा शायद।” रामी लंबी साँस लेता है: “मैं भी… तीन साल पहले मोर दुलारो बेटा इही जंगल मा गुम हो गयो रह्यो। तभी से रात-रात भर दूध लेके निकल जात हूँ। शायद कहीं मिल जाय…” (कैमरा दोनों के चेहरों पे धीरे-धीरे घूमता है। चाँदनी कभी बादल से निकलती है तो उनके आँसू चमकते हैं। नीचे बाघ अब तने से सटकर बैठ गया है। आँखें अब भी पेड़ की तरफ़ हैं। वो हिलता नहीं। बस इंतज़ार कर रहा है।) पूरी रात दोनों अपनी-अपनी ज़िंदगी की कहानी बाँटते रहते हैं। कभी चुप हो जाते हैं, कभी फिर से बोलने लगते हैं। नीचे बाघ रात भर घात लगाए बैठा रहता है।

(कैमरा दोनों के चेहरों पे धीरे-धीरे घूम रहा है। चाँद बादल से निकलकर थोड़ी रोशनी डालता है तो डाल पे बैठे दोनों

के चेहरे साफ़ दिखने लगते हैं। नीचे बाघ अब तने से सटकर लेटा है, लेकिन आँखें अभी भी खुली हैं। पूँछ कभी-कभी हिल जाती है।) रामी थोड़ी देर चुप रहकर बोलता है। आवाज़ में भारीपन है: “भइया… मोर बूढ़ी महतारी को टीबी है। तीन साल से खांसती रहती है। कभी खून भी आ जात है मुँह मा। डॉक्टर कहत है अब ज्यादा दिन नाइ हैं उनके।” रामप्रसाद चुपचाप सुन रहा है। रामी आगे बोलता है: “घर मा चार जने हैं। मोर औरत, दो लरिकन… और महतारी। सब उन्हीं की पेंशन पे पल रहें हैं। बारह सौ रुपिया महीना। उसी मा दवाई, खाना, सब चलत है। मैं दूध बेच-बेच के थोड़ा बहुत जोड़ लेत हूँ।” थोड़ी देर सन्नाटा रहता है। सिर्फ़ पत्तों की हल्की सरसराहट। रामी की आवाज़ और धीमी हो जाती है: “रात भर घर मा कोई नाइ सोत। सब जने बारी-बारी से महतारी के पास बैठे रहत हैं। कभी पीठ सहलावत हैं, कभी पानी पिलावत हैं, कभी उनके माथा पे कपड़ा रखत हैं। वो कराहती रहती हैं… और हम सुनते रहत हैं। नींद नाइ आत किसी को।” रामप्रसाद की आँखें भर आती हैं। वो कुछ कहने ही वाला होता है कि अचानक उसका चेहरा तन जाता है। (कैमरा रामप्रसाद के चेहरे पे क्लोज़-अप। उसकी आँखें थोड़ी फैल जाती हैं। शरीर में हलचल होती है।) रामप्रसाद फुसफुसाता है: “भइया… मोर से नाइ हो रहा।” रामी हैरानी से देखता है: “का होय गयो?” रामप्रसाद शर्म और मजबूरी मिली आवाज़ में बोलता है: “मूत आस लग अवत है रे… जोर से। अभी नाइ रुकत।” रामी की भौंहें चढ़ जाती हैं। नीचे बाघ की तरफ़ देखता है। बाघ ने कान खड़े कर लिए हैं। रामी धीरे से बोलता है: “अभी नाइ उतर सकत। बाघ बैठो है नीचे। थोड़ा रोक ले।” रामप्रसाद तड़पते हुए कहता है: “रोक नाइ पावत भइया… पेट फटत है। का करूँ?” (कैमरा अब नीचे बाघ पे जाता है। बाघ ने सिर उठा लिया है। आँखें पेड़ की तरफ़ चमक रही हैं। जैसे वो भी सुन रहा हो। फिर कैमरा वापस दोनों के चेहरों पे आता है। चाँदनी में रामप्रसाद की बेचैनी साफ़ दिख रही है।) रामी सोच में पड़ जाता है। फिर धीरे से बोलता है: “एक काम कर… डाल के दूसरी तरफ़ मुड़ जा। धीरे से। आवाज़ नाइ होय। और जल्दी निपटा।” रामप्रसाद हिचकते हुए डाल पे खिसकने लगता है। पेड़ की छाल उसके हाथों में चुभ रही है। नीचे बाघ अब उठकर बैठ गया है।

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(कैमरा रामप्रसाद को डाल की दूसरी तरफ़ धीरे-धीरे खिसकते हुए दिखाता है। वो बहुत सावधानी से कमर झुकाता है। नीचे बाघ ने सिर उठा रखा है, कान खड़े हैं। एक पल को पूरा सन्नाटा छा जाता है। सिर्फ़ पत्तों की हल्की आवाज़।) रामप्रसाद अपना काम निपटाकर वापस आ जाता है। चेहरे पे शर्म और हल्की राहत दोनों हैं। वो फिर से रामी के पास बैठ जाता है। साँसें अभी भी तेज़ हैं। थोड़ी देर बाद रामी धीरे से पूछता है: “अब ठीक है?” रामप्रसाद सिर हिलाता है। फिर चुपचाप बैठे-बैठे बोलने लगता है: “भइया… मोर भी घर मा दो लड़कियाँ हैं। बड़ी वाली के उमर बीस के पार हो गई। छोटी अठारह की है। दोनों की शादी के बात गाँव मा लोगन के मुँह मा तैर रहल है दिन-रात।” रामी चुपचाप सुन रहा है। नीचे बाघ फिर से तने से सटकर लेट जाता है, लेकिन आँखें खुली रखता है। रामप्रसाद की आवाज़ भर्रा जाती है: “बड़ी वाली रोज़ रोवत है। कहत है बाबूजी, मोर सहेलियन सब ब्याह के पीहर चली गईं। मैं कब तक बाप के घर बैठि रहिहौं? गाँव वाली औरतन भी काने-काने बात कटत हैं… ‘अरे देखो, रामप्रसाद की लड़कियाँ कुँवारे रहि जायेंगी’।” (कैमरा रामप्रसाद के चेहरे पे क्लोज़-अप। चाँदनी में उसकी आँखें चमक रही हैं। आँसू नाइ गिरा है अभी, लेकिन गला रुँधा हुआ है।) वो आगे बोलता है: “शादी के लिए जमीन गिरवी रखनी पड़ी। फिर भी कुछ नाइ जुटत। महाजन ब्याज के पैसे माँग-माँग के परेशान करत है। छोटी वाली तो अब पढ़ाई भी छोड़ बैठल है। कहत है बाबू, हम पढ़-लिख के का करब? शादी नाइ होई त का लाभ?” रामी बीच में बोलता है: “और बीवी?” रामप्रसाद लंबी साँस छोड़ता है: “बीवी रात-रात भर जागत रहती है। कभी बड़ी के सर के बाल सहलावत है, कभी छोटी के गाल थपथपावत है। कहत है… ‘अगर त proto नाइ कर पाओ त हम अपने गहने बेच दब। लेकिन लड़कियन के सिर से ये बोझ उतर जाय’। गहने मा बस एक चाँदी के हंसली और दो बाली बचल हैं।” अब उसकी आवाज़ टूटने लगती है: “मैं शहर मा नौकरी के नाम पे कुछ नाइ कमा पाओ। कर्ज और बढ़त गयो। अब लग रहल है… अगर इहाँ से जिंदा लौट भी गयो त उन लड़कियन के सामने मुँह नाइ दिखा पाऊँ। का जवाब देब? कि बाघ के डर से पेड़ पे बैठ के रात काट ली?” (कैमरा धीरे से नीचे बाघ पे जाता है। बाघ की आँखें अँधेरे में चमक रही हैं। जैसे वो भी ये बातें सुन रहा हो। फिर वापस दोनों के चेहरों पे। हवा में ठंड बढ़ गई है। रामप्रसाद के कंधे काँप रहे हैं।) रामी उसका कंधा दबाता है: “रो मत रे… रात कटत है। सुबह होय तो देखब का होत है।” रामप्रसाद आँसू पोंछते हुए बोलता है: “भइया… अगर मोर से कुछ होय जाय त त proto मोर लड़कियन के ख्याल रखना। बस इतना कहत हौं।” नीचे बाघ की पूँछ एक बार ज़ोर से पटी। दोनों एक साथ चुप हो गए।

जंगल की रात… सुबह का इंतज़ार (कैमरा दोनों के चेहरों पे टिका रहता है। रामप्रसाद की आँखों से आँसू बह रहे हैं, लेकिन वो आवाज़ नाइ निकाल रहा। रामी उसका कंधा पकड़े हुए है। नीचे बाघ अब फिर से उठकर बैठ गया है। उसकी साँसें सुनाई दे रही हैं – भारी और धीमी।) थोड़ी देर सन्नाटा रहता है। सिर्फ़ जंगल की रात की आवाज़ें। कभी कोई सूखी टहनी टूटती है, कभी दूर कोई जानवर की सिसकी। रामी धीरे से बोलता है: “सुन रे रामप्रसाद… त proto लड़कियन के बारे मा मत सोच अभी। पहले रात कट जाय। सुबह होय तो दोनों मिलके देखब का करत हैं।” रामप्रसाद सिर झुकाए बोलता है: “भइया… डर लाग रहल है। अगर बाघ चढ़ आओ तो?” रामी हल्के से मुस्कुराता है। मुस्कान में थकान और हिम्मत दोनों हैं: “बाघ पेड़ नाइ चढ़त रे। वो नीचे से ही घात लगाए रहत है। सब्र रख।” समय धीरे-धीरे बीतने लगता है। चाँद पच्छिम की तरफ़ ढलने लगता है। अँधेरा थोड़ा हल्का होने की कोशिश करता है, लेकिन जंगल अभी भी घना है। (कैमरा अब वाइड शॉट लेता है – पेड़ की ऊँची डाल पे दो छोटे से इंसान बैठे हैं। नीचे बाघ का काला साया। चारों तरफ़ सन्नाटा। कभी-कभी बाघ अपनी जगह बदलता है तो सूखी पत्तियाँ खड़खड़ा जाती हैं। दोनों की नींद पूरी तरह उड़ चुकी है।) रामप्रसाद फिर से बोलता है, आवाज़ बहुत धीमी: “रामी भइया… त proto सच मा अपन बेटा के खोज मा निकलत रहत हो?” रामी कुछ देर चुप रहकर जवाब देता है: “हाँ रे। तीन साल हो गए। लोगन कहत हैं कि जंगल मा जानवर खा गए होंगे। लेकिन मोर मन नाइ मानत। कभी-कभी रात को लग त है कि कहीं वो अभी भी जीवित है… कहीं रो रह्यो होगा।” रामप्रसाद उसकी तरफ़ देखता है: “और अगर नाइ मिला तो?” रामी की आवाज़ में एक अजीब सी शांति आ जाती है: “तो भी खोजत रहब। जब तक मोर साँस चलत है।” इतने में पूर्व दिशा से हल्की सी सफेदी फैलने लगती है। पेड़ों के बीच से पहली रोशनी की रेखा दिखाई देती है। बाघ अचानक सतर्क हो जाता है। वो खड़ा हो जाता है, कान फड़फड़ाता है, फिर पेड़ की तरफ़ एक लंबी नज़र डालता है। (कैमरा बाघ की आँखों पे ज़ूम करता है – उनमें अब भी भूख और इंतज़ार है। फिर वो धीरे से मुड़ता है और जंगल के घने हिस्से की तरफ़ चल पड़ता है। उसका शरीर पेड़ों के बीच गायब हो जाता है।) दोनों ऊपर से देखते रहते हैं। जब तक बाघ की आवाज़ पूरी तरह खत्म नाइ हो जाती, तब तक कोई नाइ बोलता।