नदी के भूत का प्रेम प्रसंग
(अवधी छूआँ + प्यार अउर भ्रम वाली लघु कथा)
दृश्य १: ससुराल के अँधियार घर
समय: साँझ के बाद, सूरज ढल चुकल बा (करीब सात बजे)
स्थान: पुरान गाँव के मकान, रसोई अउर आँगन
दृश्य कोण:
विस्तृत दृश्य से शुरू – पूरा घर अँधियार में डूबल बा।
मध्यम दृश्य – रसोई में झुकल नायिका।
निकट दृश्य – ओकर चेहरा पर आँसू अउर थकान।
प्रकाश व्यवस्था:
मंद पीयर बल्ब + खिड़की से आवत हल्की चाँदनी। ज्यादातर छाँह। चेहरा पर हल्की बगल वाली रोशनी जेकरा से आँसू चमके।
संवाद:
सास (कड़क आवाज़): “अरे बेकार की! रोटी जर गइल फेर! तोहार पति शहर में कमावत बा, तू इहाँ खाली खाना बर्बाद करत बाड़!”
ननद (हँसते हुए): “भाभी जी, शहर वाले पति के याद करके रोवत बाड़? ऊ त भूलि गइल होई तुहका!”
नायिका (धीमी आवाज़, सिर झुकाए): “माई जी… आज दिन भर खेत में काम कइली… थक गइली… थोड़िक बैठे देहु…”
सास: “बैठे के समय नइखे! कुआँ सूखल बा, नदी से पानी भर के ल्याव… जल्दी कर!”
दृश्य: नायिका पानी के घड़ा उठाके बाहर जात बा। पीछा करता दृश्य – ओकर पीछे सास के छाँह लंबी पड़त बा।
दृश्य २: नदी के किनारा – पहिला मिलन (संकोच अउर हिचकिचाहट)
समय: साँझ के बाद, करीब सात-साढ़े सात बजे
स्थान: गाँव के नदी के किनारा, घना पेड़ अउर बहत पानी
दृश्य कोण:
नीचे से लिया गया दृश्य – नदी के पानी चमकत बा।
कंधे पार दृश्य – नायिका नदी किनारे घड़ा रख के बैठत बा, सिर झुकाए।
अचानक कट – युवा पुरुष पहिले पेड़ के पीछे, फेर एकदम पानी के किनारे देखाई देत बा (जगह बदलल)।
प्रकाश व्यवस्था:
चाँदनी + पानी से उछलत नीली-चाँदी रोशनी। युवा के कपड़ा पर चमकदार सिल्वर-गोल्डन चमक। ओकर आवे पर हल्की कोहरा + ठंढी नीली रोशनी। नायिका के चेहरा पर नरम चाँदनी।
संवाद:
नायिका (अकेले, बहुत धीरे, लगभग फुसफुसा के): “हे भगवान… ई सब कब ले चलत रहई…”
(अचानक एक नौजवान पुरुष देखाई देत बा – चमकदार सफेद-चाँदी धोती अउर कुर्ता, चेहरा सुंदर अउर युवा, आँख में जादू।)
युवा (बहुत नरम, मीठी आवाज़): “रो मत… तोहार आँसू नदी तक पहुँचल बा।”
नायिका (सिर झुकाए, बहुत संकोच से, आवाज़ काँपत): “हम… हम तोहरा नइखीं जानत… काहे बोलत बाड़ हमसे?”
युवा (धीरे-धीरे नजदीक आवत, जगह थोड़ा बदलत): “हम इहाँ के रहने वाला बानी… तोहार आवाज़ सुन के रुक गइलीं। अगर नइखे मन त हम चले जाईं।”
नायिका (अभी भी झिझकत, एक-एक शब्द निकालत): “न… नइखे… बस… घर में… बहुत… तंग करत बाड़ीं…”
युवा (धैर्य से, विश्वास जगावत): “हम सुनब… जब मन होई तब बोलिह। हम काहू से नइखीं कहब। तोहार दुख हमार दुख बा।”
नायिका (हल्की नजर उठा के, फेर झुका के): “हम… थक गइलीं…”
युवा (मुस्कुरा के, आवाज़ में जादू): “थकल बाड़ त बैठ। हम इहाँ बानी। जब चाहब तब आव।”
दृश्य: निकट दृश्य – नायिका के आँख में पहिल बेर हल्की राहत, लेकिन अभी भी डर अउर संकोच बा। युवा अचानक पेड़ के छाँह में गायब होत बा (जगह बदलल)। नायिका हैरान अउर थोड़ा उलझन में रह जात बा।
दृश्य ३: हर रात के बात – विश्वास बढ़ना अउर माया के जाल
समय: अगला कई रात (सब सो जाए के बाद, करीब नौ-दस बजे)
स्थान: वही नदी के किनारा
दृश्य कोण:
कई निकट दृश्य – नायिका अब थोड़ा खुल के बोलत बा, युवा सुनत बा।
अचानक कट – युवा एक पल में बाएँ किनारे, फेर दाएँ किनारे (जगह बदलत रहत बा)।
ऊपर से लिया गया दृश्य – दूनो नदी किनारे, चाँद ऊपर।
धीमी गति – नायिका के आँसू पानी में गिरत बा, युवा के हाँथ हवा में नजदीक आवत बा।
प्रकाश व्यवस्था:
हर दृश्य में थोड़ा अलग – कभी नरम नीला, कभी हल्की हरी कोहरा। युवा के चमकदार कपड़ा हमेशा चमकत रहत बा। नायिका के चेहरा पर धीरे-धीरे चमक बढ़त जात बा। भ्रम अउर माया के भाव आवे पर हल्की गुलाबी-बैंगनी रंगत मिलावल बा।
संवाद (दृश्य श्रृंखला में छोटा डायलॉग – अब आराम से):
नायिका (अब थोड़ा सहज): “आज फेर सासु बहुत डांटल… कहलस पति के पैसा खाली ओनकरे बा… रात में चुपचाप निकलि अइली तोहरा पास…”
युवा (मीठी आवाज़, अचानक ओकर पीछे से बोलत): “सुन्दर, अब त बोलत बाड़… अच्छा लगल। दर्द छुपावे से बढ़त बा… हमका सब बताव।”
नायिका (हैरान, मुड़ के देखत): “तू… कइसे अचानक पीछे आ गइल?”
युवा (मुस्कुरा के, फेर सामने आ जात बा): “नदी के किनारे हमारा जगह बा… हम जहाँ चाहत बानी, उहाँ पहुँच जात बानी। तोहार आवाज़ सुन के हमार दिल भी हिलत बा। तू हमार माया में आ जा… दुख भूल जा।”
नायिका (आँख में प्यार अउर भ्रम, अब बिना झिझक): “कभी-कभी सोचत बानी… नदी में कूद जाईं… पर अब नइखीं कूदत… काहे कि तू मिलत बाड़… तोहार बात में कवनो जादू बा… तू कवन बाड़ सच में?”
युवा (आवाज़ में प्यार अउर फँसाने वाला स्वर): “हम तोहार दुख सुनए वाला बानी… तोहार प्यार पाए वाला। आ जा हमार माया के जाल में… जहाँ दुख नइखे, खाली प्यार बा। तोहार मन के भ्रम हम दूर करीं… अउर नया भ्रम देब – हमार प्यार के।”
नायिका (हल्की मुस्कान, आँख झुकाके, मोहित): “हमहूँ… तोहार बात सुन के… तोहार प्यार में पड़त जात बानी… तोहार माया हमका बाँधत जात बा… हम समझत नइखीं तू कवन बाड़… पर तोहरा छोड़ि नइखीं सकत…”
दृश्य: आखिरी निकट दृश्य – नायिका अउर युवा के आँख मिलत बा। युवा अचानक ओकर बाएँ से दाएँ तरफ चले जात बा (जगह बदलल)। नायिका के आँख में जादू अउर भ्रम चढ़ल देखाई देत बा।
दृश्य ४: बिहान के रोशनी – माया में डूबल फैसला
समय: बिहान, सूरज उगते
स्थान: नदी किनारा → घर के आँगन
दृश्य कोण:
सुनहरी बेला वाला विस्तृत दृश्य – सूरज निकलत बा, नदी चमकत बा।
पीछा करता दृश्य – नायिका घर लौटत बा, कंधा सीधा, आँख में नया जोश अउर थोड़ा मोह।
निकट दृश्य – सासु के चेहरा हैरानी से देखत बा।
आखिरी दृश्य – नदी के तरफ वापस देखत नायिका, आँख में प्यार, दर्द अउर भ्रम दूनो।
प्रकाश व्यवस्था:
गर्म सुनहरी धूप। नदी पर चमकत किरन। घर के भीतर भी हल्की रोशनी फैलत बा। पहिले के अँधियार के उल्ट पूरा दृश्य उजियार। नदी के याद आवे पर हल्की नीली-बैंगनी रंगत फेर से आवत बा, जे माया के संकेत देत बा।
संवाद:
सास (हैरान): “इतना सबेरे कहाँ से आवत बाड़? चेहरा चमकत बा…”
नायिका (शांत लेकिन दृढ़ आवाज़, आँख में मोह): “माई जी… नदी किनारे बैठ के सोचलीं… पति जब लौटी त ओका एक मजबूत मेहरारू मिली, रोवत वाली नइखे। आज से हम काम करीं… पर इज्जत से।”
ननद (चिढ़कर): “अरे सुन त… कवन से अनजान जवान से बात करे लगल बाड़ का?”
नायिका (मुस्कुराते हुए, आँख में नम अउर जादू): “हाँ… नदी किनारे एक युवा मिलल… पहिले बहुत झिझकल रहीं, पर ओकर बात सुन के दुख हल्का होत बा। अउर… ओकर प्यार में हम पड़ि गइलीं। ओकर माया के जाल में हम फँस गइलीं। अब हम बाँटी नइखीं… बदलीं। पर ओका कभी नइखीं भूलब… चाहे ऊ कवनो होखे…”
दृश्य: नायिका घर के भीतर जात बा। पीछे नदी के पानी चमकत रहत बा। धीरे-धीरे पर्दा पर लिखल आवत बा:
“कभी-कभी सबसे गहरा अँधियार… नदी के किनारे उजियार बन जात बा।
अउर कबो-कबो… एक अनजान युवा के माया अउर प्यार… दिल के घर हमेशा के लिए बसा लेत बा।”
अब पहिला मिलन में नायिका बहुत झिझकत अउर कम बोलत बा। युवा धीरे-धीरे ओकर विश्वास जीतत बा। बाद के रात में ऊ आराम से खुल के बात करत बा।
दृश्य ५: शक अउर पीछा
समय: एक रात, सब सो जाए के बाद (करीब दस बजे)
स्थान: घर के आँगन → नदी के रास्ता → नदी किनारा
दृश्य कोण:
विस्तृत दृश्य – घर के आँगन में सास अउर ननद चुपके से दरवाजा खोलत बाड़ीं।
पीछा करता दृश्य – नायिका अँधियार रास्ता से नदी तरफ जात बा, पीछे सास-ननद छिप-छिप के आवत बाड़ीं।
कंधे पार दृश्य – सास-ननद पेड़ के पीछे से देखत बाड़ीं।
प्रकाश व्यवस्था:
बहुत कम रोशनी, खाली चाँदनी। सास-ननद के चेहरा पर ठंढी नीली छाँह। नदी तरफ जात नायिका के कपड़ा पर हल्की चमक।
संवाद:
सास (फुसफुसा के): “देखल! हर रात नदी जात बाड़। कवन से जवान से मिलत होई!”
ननद (चिढ़ के): “हम कहत रहीं… शहर वाले पति के भूल के कवनो अनजान से बात करत बाड़। आज पकड़ब!”
(नायिका नदी किनारे पहुँचत बा। युवा चमकदार कपड़ा में अचानक पेड़ से पानी किनारे आ जात बा।)
नायिका (अब बिना झिझक, प्यार से): “तू आ गइल… आज बहुत देर हो गइल लगल।”
युवा (मीठी आवाज़): “तोहार इंतजार में बानी। आज तोहार आँख में कवनो नया बात बा।”
नायिका (हल्की मुस्कान): “हाँ… अब हम तोहरा बिना रहि नइखीं पावत।”
दृश्य: सास अउर ननद के आँख फट जात बा। निकट दृश्य – दूनो के चेहरा पर गुस्सा अउर हैरानी।
दृश्य ६: प्यार के गहराई – पानी में जाने के तैयार
समय: उसी रात, थोड़ी देर बाद
स्थान: नदी के किनारा
दृश्य कोण:
निकट दृश्य – नायिका अउर युवा आमने-सामने।
अचानक कट – युवा एक पल में पानी के अंदर तक, फेर किनारे (जगह बदलल)।
धीमी गति – नायिका के पाँव पानी में उतरत बा।
प्रकाश व्यवस्था:
गहरी नीली-बैंगनी रोशनी। युवा के चमकदार कपड़ा पानी पर भी चमकत बा। नायिका के चेहरा पर प्यार अउर त्याग के चमक।
संवाद:
नायिका (आवाज़ में प्यार अउर दर्द): “हम तोहरा से प्यार करत बानी… घर में कोउ नइखे मानत। सासु-ननदी हमार बात पर भरोसा नइखे करत। अब हम तोहरे साथ रहब चाहत बानी।”
युवा (गहरी आवाज़, जादू भरा): “सुन्दर… तू हमार माया में पूरा फँस गइल बाड़। अगर सच में प्यार करत बाड़ त पानी में आ जा। इहाँ दुख नइखे… खाली हमार प्यार बा।”
नायिका (पाँव पानी में डालत, आँख में आँसू अउर मुस्कान): “हम तैयार बानी… तोहार साथ में डूब जाईं। दुनिया के सब दुख छोड़ के… खाली तोहरा लेब।”
दृश्य: नायिका धीरे-धीरे पानी में उतरत जात बा। युवा के आँख में प्यार चमकत बा।
दृश्य ७: सूरज के रोशनी अउर परिवार के बचाव
समय: बिहान के पहिले, आसमान में हल्की लाली
स्थान: नदी किनारा
दृश्य कोण:
विस्तृत दृश्य – सास अउर ननद पेड़ के पीछे से दौड़त निकलत बाड़ीं।
मध्यम दृश्य – नायिका पानी में खड़ी, युवा ओकर सामने।
निकट दृश्य – सूरज के पहिली किरन युवा पर पड़त बा।
धीमी गति – युवा के चमकदार कपड़ा जलत-पिघलत देखाई देत बा।
प्रकाश व्यवस्था:
अचानक सुनहरी सूरज के रोशनी फैल जात बा। युवा के शरीर अउर कपड़ा से धुआँ अउर चमक निकलत बा। नायिका के चारों तरफ अभी भी हल्की नीली माया। सास-ननद के तरफ साफ उजियार रोशनी।
संवाद:
सास (चिल्ला के दौड़त): “अरे बहू! का करत बाड़? पानी से निकल!”
ननद (डर अउर चिंतित): “भाभी… वापस आव! ई जवान कवनो सामान्य नइखे!”
नायिका (पानी में, आँख युवा पर): “हम नइखीं आवत… हम तोहार प्यार में बानी…”
युवा (आवाज़ कमजोर होत, शरीर जलत): “सुन्दर… तोहार प्यार इतना सच बा… कि हम सूरज के रोशनी में जलत जात बानी। हम भूत रहीं… तोहार प्यार हमका जला दिहलस…”
नायिका (हैरान अउर रोवत): “तू… का बोलत बाड़? मत जा…!”
सास (पानी में उतर के नायिका के हाथ पकड़त): “ई हमार घरेलू बात बा! बहू हमार बा… काहू अनजान के साथ नइखे जाए दिहल जाई!”
ननद (साथ में खिंचत): “आव भाभी… घर चल। ई सब हम सब के बीच के बात बा।”
दृश्य: सास अउर ननद मिल के नायिका के पानी से बाहर खिंचत बाड़ीं। युवा सूरज के रोशनी में धीरे-धीरे जलत-मिटत जात बा, आखिरी मुस्कान छोड़त।
दृश्य ८: घर के वापसी – घरेलू बात
समय: बिहान, सूरज पूरा निकलि चुकल बा
स्थान: नदी किनारा → घर के रास्ता → आँगन
दृश्य कोण:
पीछा करता दृश्य – सास अउर ननद नायिका के दूनो तरफ से पकड़ के घर ले जात बाड़ीं।
निकट दृश्य – नायिका के चेहरा पर आँसू अउर खालीपन।
विस्तृत दृश्य – घर के आँगन में तीनों प्रवेश करत बाड़ीं।
आखिरी निकट दृश्य – सास के हाथ नायिका के कंधा पर।
प्रकाश व्यवस्था:
पूरी सुनहरी धूप। अब कोनो नीली या जादुई रोशनी नइखे। सब कुछ साफ अउर घरेलू उजियार।
संवाद:
नायिका (रोवत, कमजोर आवाज़): “ऊ… जल गइल… हमार प्यार…”
सास (कड़क लेकिन अब नरम): “चुप कर! ई सब माया रहल। तू हमार बहू बाड़… शहर में तोहार पति बा। ई घरेलू बात बा… बाहर के कवनो जवान से नइखे निपटल जाई।”
ननद (हल्की चिढ़ लेकिन चिंता से): “अगली बेर नदी अकेली मत जाइह। हम सब बाटीं… दुख होई त हमका बताव।”
सास (नायिका के कंधा थपथपात): “अब घर चल। सुबह हो गइल बा। तनी आराम कर… बाद में चाय बना के पिया देब।”
दृश्य: तीनों घर के अंदर जात बाड़ीं। पीछे नदी चमकत बा, लेकिन अब खाली पानी। पर्दा धीरे-धीरे अँधियार होत बा।
पर्दा पर लिखल आवत बा:
“प्यार जब माया बन जाय…
त सूरज ओका जला दे।
अउर परिवार…
चाहे जितना कड़क होखे…
अपना बहू के बचावे।”
समाप्ति
अब “रोटी गरम बा” हटा दिहल गइल बा।
सास अब कहत बाड़ीं – “सुबह हो गइल बा। तनी आराम कर… बाद में चाय बना के पिया देब।”
ई तार्किक बा, काहे कि रात भर नदी पर रहे के बाद घर आकर ताजा रोटी नइखे हो सकत।
अगर अउर कवनो छोटी-मोटी गलती लगत बा त बता दीह।



















