कफ़न पर खून के छीटे जिगर में चाक नहीं love shayari ,

0
604
कफ़न पर खून के छीटे जिगर में चाक नहीं love shayari ,
कफ़न पर खून के छीटे जिगर में चाक नहीं love shayari ,

कफ़न पर खून के छीटे जिगर में चाक नहीं love shayari ,

कफ़न पर खून के छीटे जिगर में चाक नहीं ,

सुकून ए रूह नहीं तो फिर ये रवायत भी नहीं ।

 

ग़ुमनाम रास्तों में अब भी तेरी ख़ुश्बू है ,

मैं बेरुखी से गुज़रा हूँ गलियाँ बदल बदल ।

kahani bhoot ka,

मेरे सफर का मैं हमसफ़र तन्हा ,

मेरी तन्हाइयों का हमशक्ल तन्हा ।

 

सर पर सेहरा तिरंगे का बदन पर मिटटी का उबटन ,

खुशबु वतन की साँस में भर कर दमकता है रणबांकुरों का यौवन

 

इन रंगीन लबों के जो इशारे हैं ,

रात ने सरगोशियों में सँवारे हैं ।

literature poetry 

चाक जिगर के सिलना ही है गर दस्तूर ए ज़माना ,

गोया क्यों कर मोहब्बतों को ऐसे ज़ख्म देता है ज़माना

 

दरिया को उस झील की प्यास है फ़राज़ ,

जिसमे हो चांदनी का हमाम और दमकता माहताब निकले ।

 

हलक़ से जान जैसा कुछ अटका निकला ,

सारा का सारा शहर दुश्मन ए जान निकला ।

 

सांझ ढलते ही तारों सी टंग जाती है फलक पर मोहब्बत तेरी ,

गोया यूँ ही बस ताकती है या नज़रबंदी का भी इरादा है ।

 

रात भर पलकों की पतवार है चली ,

यूँ ही नहीं बहे दो नैनो की धार में कजरा गज़रा सुर्ख लबों की लाली कहीं कहीं ।

 

इन होठों पर मोहब्बत जैसा कुछ लिखने को मन करता है ,

आज की रात तेरे गुलबदन से शब् ए गुलज़ार करने का मन करता है ।

 

तुम तो ज़माने भर को रक़ीब बना लो ,

हमसे एक जमाल ए यार सम्हाला नहीं जाता ।

 

शहर ए दाना में रक़ीबों के ईमान बदल जाते हैं ,

मौसम ए ज़र्द में मेहबूब ए मिजाज़ टटोलो तो सही ।

 

हाक़िम थे जो ख़ुदा के मेहबूब हो गए ,

सज़दे में उनके जान वो रक़ीब हो गए ।

 

तुम दूर तलक साथ चलने का वादा ही कर देते ,

हम राह ए मंज़िल क्या रक़ीब ही बदल देते ।

literature poetry 

फ़ितरत से कोई कभी ख़ुदा नहीं होता ,

हम तो बस मोहब्बत में उनको अपना रक़ीब कह गए ।

pix taken by google