मैय्यत ख़ाक पहुंचेगी क़ब्र गाहों तक alfaaz shayari ,

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मैय्यत ख़ाक पहुंचेगी क़ब्र गाहों तक alfaaz shayari ,
मैय्यत ख़ाक पहुंचेगी क़ब्र गाहों तक alfaaz shayari ,

मैय्यत ख़ाक पहुंचेगी क़ब्र गाहों तक alfaaz shayari ,

मैय्यत ख़ाक पहुंचेगी क़ब्र गाहों तक,

जनाज़े उठने से पहले सियासी कफन तक लूट लेते हैं ।

 

तर्क़ ओ ताल्लुक़ और लहू का रिश्ता ,

एक ज़ौक़ ए महफ़िल भी गया तुझसे दोस्ती के बाद ।

 

हम तो बर्बाद रहे तेरी मोहब्बत खातिर ,

तू मर मिटा किसकी दोस्ती की खातिर ।

 

मेरी ताजपोशी में शामिल हो वही दोस्त,

जो मेरी बर्बाद मोहब्बत को सजाने में शामिल होगा ।

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ज़रूरतें क्या हैं दोस्तों की मेरी बर्बादी के लिए ,

मैं खुद अपनी तबाही के लिए पुख्ता हूँ ।

 

बेज़बान क़लम की ताक़त पर तख्ते भी पलट जाते हैं,

ऐ मगरूर इब्न ए इंसान अपनी शख्सियत पर इतना ग़रूर न कर ।

 

रोज़ मर्रा के खर्चों में बादशाहों की बादशाहत चली गयी,

सियासत में शेख चिल्ली के ख़ज़ाने ख़त्म होते नहीं ।

 

सियIसियों की दखलंदाज़ी से मुकम्मिल मज़हबों का पता चलता है,

गोया फितरत ए इंसान की रंग ओ बू और चेहरे एक जैसे दीखते हैं

 

अहमक बना रखा है अवाम को हुकुमरानों ने ,

रूबरू ए इश्क़ भी होता है और भाभी जान के किस्से भी सुनाते हैं ।

 

जिन जनाज़ों का अगुआई सियासी हो,

वो मुर्दे ख़ाक मुकम्मल क़ब्रिस्तान पहुंचेंगे

 

कभी लफ्ज़ नहीं मिलते कभी ज़बान नहीं खुलती ,

एक उम्र गुज़र जाती है हाल ए दिल को मुकम्मल बनने में

 

डूब कर निकला हूँ इश्क़ ए दरिया से,

प्यास जस की तस मुकम्मल है ।

 

शहर भर के निकम्मों ने इश्क़ ए क़ौम छोड़ दी,

सारे के सारे हुश्न ए दानाई बेरोज़गार हो गए ।

 

जिन आँखों में कभी इश्क़ ए बादशाहत के ख्वाब सजते थे ,

अब वही आँख तार तार ज़ख़्मी है ।

 

कमबख्त वो भी ज़माने से जा मिली दिल की बादशाहत नहीं देखी,

हमने मुफलिस ए दिल में न जाने कितने ताज़ बना रखे हैं ।

 

ख्वाहिशें ऐसी की आस्मां मचल जाए,

शर्म ओ हया ऐसी की चिलमन की ओट में हुश्न ज़ार ज़ार हो जाए

 

एक ख्वाहिश थी जहां में हम भी अपना घर बनाएंगे ,

मगर जहां में कोई हम ज़बीं नहीं मिलता ।

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परिंदों की ख्वाहिश है ज़मीने बाँट लो जितनी,

खुले आसमानों की हवाओं में न हमको रोक पाओगे।

pix taken by google ,