कब्रों में भी कहाँ सुकून पाती हैं love shayari,

On: April 18, 2025 5:24 PM
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कब्रों में भी कहाँ सुकून पाती हैं love shayari,

कब्रों में भी कहाँ सुकून पाती हैं love shayari,

कब्रों में भी कहाँ सुकून पाती हैं ,

कारोबारी दौर की रूहें रुपैया पैसों में ही उलझी नज़र आती हैं ।

 

पेट की जलती भट्ठियों में दो चार टुकड़े डाल दो,

बुझ गया तंदूर क्या जलते अंगारे डाल दो ।

 

शहर भर का उजाला क्या कम था ,

जो ज़फर रोशनी की खातिर आशियाना मेरा फूँक गए ।

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हर रोज़ तेरे कूचे में जा बैठता है ज़फर ,

उजाला मेरे चरागों का घर में टिकता नहीं ।

 

होनेवाले होंगे क़तरे कतरे को मोहताज़ ,

मैं हथेली में मोहब्बत का समन्दर लिए फिरता हूँ ।

 

बोलता नहीं ख़ामोश रहकर भी रुपैया ,

खना खन ज़माने की नैमतों को तौल देता है ।

 

क़फ़न मैला है मेरे पिंजरे का ,

रोज़ धोता हूँ ज़फर फिर भी दाग जाता नहीं ।

 

चलने दो जश्न होने दो रौशनी शहर में ,

हम भी देखेगे क़फ़स कितना ज़हर उगलता है ।

 

रौशनी और पटाखों के शोर ओ गुल में कहीं ,

शहर के किसी कोने में आज फिर यतीम भूखा है ।

 

शहर भर की रौशनी कम है ,

सूखे पत्तों के झोपड़े में आँखें अब भी नम है ।

 

दो नैनो के टिमटिमाते दिए बुझते नहीं ,

फिर कोई आज दिवाली में दिल जलाया होगा ।

 

रौशनी दूर तक बह जाती है ,

उन आँखों का समंदर थामने से नहीं थमता ।

 

क़फ़स में जलते चरागों की रौशनी कैसी ,

अंजुमन में खिले फूलों का मुस्कुराना जैसा ।

 

चश्म ए चरागों में बुझा बुझा सा है ,

ज़माने के शाद ओ जश्न रास आते नहीं ।

 

नुदरत नहीं है सब्ज़ बाग़ की खुशबुओं में वो ,

कोई तो बुग्ज़ हो जो रज़्म ए वफ़ा करे ।

 

रात की रंगीनियों के जुगनुओं से चमकते मिजाज़ ,

सौंधी सौंधी मिटटी की खुशबुओं से गमकते चराग ।

bewafa shayari 

धरा के छोर से उस ओर ख़बर से बेख़बर साहिल ,

सफ़र की कंदराओं में भरा सागर ही सागर हो ।

 

शिखर की चोटियों से पूछो ऊँचाइयों के सफ़र में ,

कितने पर्वत गिर गिर के सम्हाले होंगे ।

pix taken by google

Pushpendra Dwivedi

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