गरीबों के लिए ,

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गरीबों के लिए ,
गरीबों के लिए ,

गरीबों के लिए ,

गरीबों के लिए कभी कोई सरकार नहीं बनती ,

जाने कैसी कैसी खुशफ़हमी लोग पाल रखे हैं ।

 

कुछ परिंदे जिनका पुराने दरख़्तों पर बसेरा था ,

वो शहर की गलियों में अब आब ओ दाना तलाश करते हैं ।

 

तुम क़तरा क़तरा मेरे लफ़्ज़ों में जान भरो ,

हम गीली स्याही से ज़माने को जला जायेंगे ।

 

सड़कें तो चौड़ी हो गयी हैं मेरे शहर की ,

साद ए दिल को अब कहीं महफ़िल नहीं मिलती तो कहीं मंज़िल नहीं मिलती ।

 

वो मुझसे मेरी हाज़िर जवाबी माँगता है ,

गोया जुदा होता तो क्या हर लम्स बनकर धड़कता सीने में

 

 

परिंदों को परिंदे जीने नहीं देते ,

शहर ए रौनक में क्या ख़ाक ए मुजस्सिमो को पाल रखा है ।

 

शायरों की महफिलें सजती हैं सेहर का इंतज़ार किये बगैर ,

बदस्तूर हर वार दिल पर लेते हैं क़हर की परवाह किये बग़ैर ।

 

लड़खड़ाते लफ़्ज़ों को सम्हाल लेते हैं ,

तेरे तसब्वुर के बाद मेरे लब तक आते आते पैमाने ।

 

बत्तियाँ बुझा दो अब तो जश्न ख़त्म ,

ये रोशनी चुभती ही नहीं शहर ए दामन को ज़ार ज़ार करती है ।

 

दिल ए फाख्ता पे नज़र रखते हैं ,

हम तो टुकड़ों में बसर करते हैं ।

 

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सर पर खुर्सीद ए हिज़ाब यूँ सरे आम खुर्रम मिजाज़ी ,

ख़ानुम की ख़ुतबाबाजी ही समझी जाएगी ।

 

मैं मीलों चल भी दूँ पैदल तो क्या खुर्सीद का वारिश हूँ ,

शहर के हर गली कूचे में अँधेरा घर जमाया है

 

सर पर जो शेर ओ शायरी का शबाब चढ़ता है ,

क्या शब् ए माहताब तुझ पर भी ख़ुमार रहता है ।

 

वो कहते हैं सारी रात जाग के इश्क़ का माहौल बनाइये ,

अब है ख़ुमार ए इश्क़ तो कह रहे हैं गोया बत्तियाँ बुझाइए

 

मैं नदी का समतल धरातल मन गगन की डोर संग ,

ओर से उस छोर तक स्तब्ध साहिल चूमती कल कल लहर

pix taken by google