blood-curding story destroy the empire ,

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अँधेरी सुनशान गलियों में कुत्तों के भौंकने के साथ कुछ आवारा औरतों के हंसने की आवाज़ें सुनाई देती है , तभी ऊपर से कुछ परिवारों के मेंबर्स ब्लैक पॉलीथिन में खाने से बचे हुए मांस के टुकड़े घर की बालकनियों से नीचे फेंक देते हैं और चिल्ला कर कहते हैं चली जाओ बदजात दुष्ट चुड़ैलों हमारे परिवार के बच्चों को बक्श दो क्या बिगाड़ा है हमारे बच्चों ने तुम्हारा , इतना कहकर घर की खिड़कियाँ बंद कर लेती हैं , इधर गली में घूम रही बदजात औरतें उन मांस के टुकड़ों को उठा उठा कर बड़े चाव से खाने में व्यस्त हो जाती है और कहती है आज तो बच गए तुम्हारे बच्चे कब तक बचाओगी अपने परिवार के मर्दों को ।

कहते हैं के त्रिजुआ कैट के विभाजन के बाद दुष्ट आत्माओं और पुण्य आत्माओं के बीच घमाशान युद्ध हुआ , इस युद्ध का कोई परिणाम तो नहीं निकला मगर त्रिजुआ कैट ज़रूर दो भागों में बँट गया एक का नाम धीम पुर पड़ा और दूसरे का अधीम पुर , धीम पुर में पुण्य आत्माओ का और अधीम पुर में दुष्ट आत्माओं का निवास था त्रिजुआ कैट का पूर्व राजा चिरोटा अत्यंत बलशाली था , किन्तु उसकी कुछ गलत आदतों की वजह से उसे पुण्यात्माओं का राज्य धीम पुर छोड़ कर अधीम पुर में जाकर बसना पड़ा , चिरोटा सूरा सुंदरा का शौक़ीन था जिसके चलते उसने स्वयं की महारानी का त्याग कर एक बदजात डायन के साथ दैहिक सम्बन्ध बना रखे थे , रात भर ऐय्यासी में डूबे रहने की वजह से चिरोटा को राज्य से बेदखल कर दिया गया था , अब चिरोटा मात्र नाम का राजा था राज्य की सारी देख रेख मंत्रिमंडल और चिरोटा के रिश्तेदार देख रहे थे , चिरोटा की दो पुत्रियां थी चारु , वीचारु दोनों विलक्षण शक्तियों की धनी थी ,किन्तु बाप के बदजात महिला के संपर्क में आने की वजह से उसे कुछ यौन सम्बन्धी अनुवांशिक बीमारियाँ हो गयी थी जिसके चलते उनकी शक्तियां भी धीरे धीरे क्षीण होती जा रही थी ,

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बाल्यावस्था तक तो सब सामान्य था किन्तु यौवन आते आते दोनों राजकुमारियों में शक्ति के साथ सौंदर्य भी क्षीण होने लगा , जिसके चलते धीम पुर का कोई भी नवयुवक दोनों राजकुमारियों में से किसी को अपनाने के लिए तैयार नहीं था , धीरे- धीरे दोनों राजकुमारियों की मानसिकता कुण्ठाग्रसित होती जा रही थी , इन सब चल रहे दुष्चक्रों का प्रमुख दोष चिरोटा को भी नहीं दिया जा सकता था , क्यों की बचपन में ही चिरोटा के माँ बाप किसी महामारी के चलते चल बसे थे जिसके कारण उसका लालन पालन उसके सगे सम्बन्धियों ने किया था , अनाथ चिरोटा का बचपन सब कुछ होते हुए भी अभावग्रस्त गुजरा था , उचित उच्च शिक्षा का अभाव कुलीन लोगों से दूरी और दूसरों से अपनेपन का न मिल पाना चिकोटा को दुर्व्यसनो की ओर धकेलता चला गया और जब राज्य सम्हालने योग्य हुआ तब वह पूरी तरह से कुसंगति के जाल में फंस चुका था , सालों से नेतृत्व विहीन त्रिजुआकैट भीतर ही भीतर दो भागों में बँट चुका था , दुष्ट आत्माओं का प्रकोप बढ़ रहा था , पुण्य आत्माएं त्राहिमाम कर रही थी , वर्षों बाद राजा मिला वो भी अप्सरा और रक्कासाओं की पनाह में पड़ा रहता था , रियाया की सुख शांति की उसे परवाह नहीं थी , इधर दुष्ट आत्माओं ने अपना नया नेता चुन लिया था , जिसका नाम था फुवांचू वो किसी भी पल चिकोटा के राज्य में हमला करने के लिए तत्पर था ,

लेकिन फुवांचू चाहकर भी त्रिजुआकैट पर हमला नहीं कर सकता था , क्यों की वो उसे अपनी रगों में बह रहे गंदे खून को

पुण्य आत्माओं के खून से मिलाकर अपनी नश्लें जो सुधारनी थी , उसने चिरोटा की तरफ दोस्ती का हाँथ बढ़ाया और चिरोटा उसकी चालाँकि समझ नहीं पाया उसने फुवांचू की मित्रता का आमंत्रण स्वीकार कर लिया , दोनों घरानो में मित्रता का दौर सुरु हुआ दोनों एक दूसरे के महलों में बेरोक- टोक आने जाने लगे मर्दों की मित्रता के साथ साथ धीरे धीरे दोनों राज्यों की महारानियों का आना जाना भी सुरु हो गया , फुवांचू ने अपने बावर्ची खाने में जिस खानसामा को लगाया था उसे ख़ास हिदायत दे रखा था की दस्तर खान में परोसे गए खाने में कुछ गंदे खून की बूँद को भी मिलाया जाए ताकि , पुण्य आत्माओं को धीरे धीरे दुष्ट आत्माओं में बदला जा सके , और ये परिवर्तन एक दिन में संभव नहीं था , इसके लिए दुष्ट आत्माओं वाले मुर्दों का खून पुण्य आत्माओं के लिए धीरे धीरे असर करने वाले मीठे ज़हर का काम कर रहा था , अब गंदे खून का असर चिकोटा और उसके परिवार के सदस्यों पर भी गंदे खून का असर साफ़ दिखाई देने लग गया था , उनकी त्वचा का रंग बात करने का लहज़ा और और सबसे ज़्यादा असर तो उनके मस्तिष्क में उठने वाले विचारों पर पड़ रहा था जो की अब धीरे धीरे दुष्ट आत्माओं जैसे होते जा रहे थे , और सब से ज़्यादा असर चिकोटा की दोनों राजकुमारियों में दिखाई देने लग गया था , क्यों की वो शारीरिक और मानसिक रूप से अपरिपक्व थी , और उन्होंने अपनी ज़िन्दगी में कुछ ख़ास देखा भी नहीं था , उनके मन और शरीर को दूषित करने के लिए फुवांचू ने ख़ास तरह के ऐश ओ आराम को व्यवस्था कर रखी थी ,

चिकोटा अब पूर्णतः फुवांचू के सियासी मकड़ जाल में फंस चुका था , यहां तक की धीम पुर का खज़ाना भी धीरे धीरे खाली होता जा रहा था , फुवांचू के नुमाइंदे धीमपुर के कोने कोने में छुपे रहते थे , जो की धीमपुर की हर एक गति विधि से फुवांचू को अवगत कराते रहते थे , यहां तक की चिकोटा के घरेलु मामलों में भी फुवांचू की दखल थी , महल के अंदर होने वाली हर एक गतिविधि से फुवांचू भलीभांति अवगत था , विषाक्त भोजन और अत्यधिक सुरा सुंदरा के सेवन के चलते चिकोटा के मस्तिष्क के साथ साथ शरीर भी रोगी होता जा रहा था , चिकोटा को अब अपनी राजकुमारियों के विवाह की चिंता हो रही थी , उधर चिकोटा की दोनों बेटियां फुवांचू के दोनों बेटों के साथ बचपन से पल बढ़ रही थी , और फुवांचू चाहता था की उसके बेटों को विवाह चिकोटा की बेटियों के साथ हो जाए , इस तरह उसके खान दान की रगों में बह रहा दूषित खून पवित्र हो जायेगा , और उसे भी पुण्यात्माओं के रिश्तेदार होने का खिताब मिल जायेगा , और च्यूंकी धीमपुर का कोई उत्तराधिकारी नहीं है इसलिए चिकोटा की मौत के बाद सारे राज्य पर उसी का हक़ होगा , इसलिए उसने अपने बेटों को अच्छी तरह से सीखा पढ़ा रखा था की हर हाल में तुम्हे चारु और वीचारु दोनों को अपने प्रेम जाल में फसाये रखना है , और विवाह के लिए दबाव बनाये रखना है , चाहकर भी फुवांचू के दोनों बेटे रंजन और चितरंजन अपने बाप की आज्ञा की अवहेलना नहीं कर सकते थे ,

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और आखिरकार हुआ भी वही जो फुवांचू चाहता था , उसने एक दिन लगी छनी में चिकोटा से अपने दिल की बात कह डाली , और चिकोटा फुवांचू के द्वारा दिए गए अपने दोनों बेटों के लिए विवाह प्रस्ताव को मना नहीं किया जा सका क्यों की चिकोटा शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से जीर्ण छीण हो चुका था , बेटियां भी बाप के निर्णय का विरोध नहीं कर पायीं , और चिकोटा की दोनों बेटियों चारु और वीचारु का विवाह फुवांचू के दोनों बेटों रंजन और चितरंजन के साथ संपन्न कर दिया जाता है , दोनों राज्यों में हर्ष का माहौल छा जाता है मगर धीमपुर की जनता इस विवाह के विरुद्ध खड़ी हो जाती है , और वो मन ही मन चाहकर भी चिरोटा का विरोध नहीं कर पाती है खैर चारु और वीचारु को इससे घंटा कुछ फर्क नहीं पड़ता है , रंजन और चितरंजन चारु और वीचारु के मोहजाल में पूर्णतः फंस चुके थे , और आखिर वो क्षण भी आगया जिसका दोनों बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे , दोनों राजकुमारियों को अधीमपुर लाया गया , नगर में प्रवेश करते ही पहले तो वो वहां के रहवासियों को देख कर डर गयीं मगर फिर अपने आपको सम्हाल लीं , इधर दोनों राजकुमारियों के सयन कक्ष को सुहागरात के लिए रकम रकम के फूल पत्तियों और इत्र फुलेल से सजाया गया और उनके लिए ख़ास तरह के रोगन रक्त सोरबा एवं केशर युक्त दूध का इंतजाम किया गया ताकि रात्रि कालीन कार्यक्रम में कोई विघ्न न पड़े और सुहागरात का प्रोग्राम शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो जाए , कुछ ही देर में रंजन और चितरंजन चारु और वीचारु के कमरों में घुसते हैं , चारु के कमरे में घुसते ही रंजन को जन्नत का एहसास होता है , वो घूंघट में छुपे हुए चाँद से मुखड़े को देखने के लिए आगे बढ़ता है तभी चारु उछल कर अपने बेड पर खड़ी हो जाती है और और रंजन को तिरछी नज़रों से देख कर गाना गाने लगती है बलमा हमार मिले बड़े रंग रसिया चारु का ये रूप देखकर रंजन थोड़ी देर के लिए तो डर जाता है , मगर काम अग्नि में जल रहा रंजन अपने आपको ये सोच कर सम्हाल लेता है बाहरी रूप तो मात्र मोह माया है असली प्यार तो अंदर की काया है , यही सोच कर वो उतार से ढलान की तरफ बढ़ ही रहा था , की झाडी झांकाडियों के बीच सफा- चट मैदान देख कर भयभीत हो कर रह जाता है , उसके मुख से सारा तेज़ गायब हो जाता है और शादी के बाद के जन्नत का दिवास्वप्न एक झटके में चकना चूर हो जाता है , उसके मुख से चीख निकल जाती है , और वो सीधा कमरे का द्वार फाड़ता हुआ जंगल की तरफ ४०० किलोमीटर प्रति मिनिट की रफतार से भाग जाता है , फुवांचू ये दृश्य देखकर भौचक्का रह जाता है ऑफर कहता है दुष्ट आत्माओं के देश में ये सब आम बातें हैं , चू,,,, के चक्कर में चु ,,, गया लव, मैं भी तो जब पहली बार अपनी पत्नी से मिला था तब मेरे भी तोते ऐसे ही उड़े थे ,

इधर चितरंजन ने दिल में सुहागरात मनाने के ख्वाब सजाये सयन कक्ष में प्रवेश मारा ही था की , वीचारु उसे देखते ही

चीख पड़ी और बोली देखो मैं किसी और की अमानत हूँ और मैं नहीं चाहती की मेरे गर्भ में पल रहा बच्चा तुम्हारे द्वारा फेंकी गयी गन्दगी से गन्दा हो , हाँ लेकिन मैं एक वादा ज़रूर करती हूँ मैं तुम्हारे दिल में पल रहे अरमानो को नहीं तोङूगी बस इस बच्चे की डिलीवरी के बाद मैं तुम्हे वो तमाम सुख उछल उछल कर दूँगी जो तुमने हम दोनों को लेकर अपने दिल में सजाये थे , और बस इस बच्चे को इस दुनिया में आ जाने दो ताकि मैं ये जिसकी अमानत है उसके सुपुर्द करके अपने आपको पूर्णतः तुम्हारे हवाले कर सकूं , इतना कहते हुए वीचारु चितरंजन के पैजामे के ऊपर हाँथ फेर देती है जिससे की चितरंजन अपने साथ हुयी बेवफाई का ग़म बड़े आराम से भूल जाता है , और चितरंजन की शेरवानी पकड़ कर उसे अपने ऊपर खींच लेती है और ऊपर ऊपर वो सब करने देती है जो सुहागरात में होता है बस वो नहीं करने देती जिससे की उसका पुण्य आत्माओं वाला बालक प्रदूषित हो , वीचारु का अपने प्रति प्रेमाकर्षण देख कर चितरंजन की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता है वो धीर धीरे पूर्णतः वीचारु के मोह पास में फंसता चला जाता है , और वीचारु के इशारों पर नाचने लगता है , इसी के साथ अधीमपुर का भावी महाराज महज़ एक सुंदरी का गुलाम बनके रह जाता है ,

इधर चिकोटा अपनी दोनों बेटियों का घर बसा देखकर अत्यनत खुश होता है , मगर चारु के साथ जो घटित होता है इस बात का छोभ कहीं नहीं चिकोटा को रह रहकर दिल ही दिल में अंदर ही नादर कहीं न कहीं कचोटता है , मगर वो अपने भीतर की कथा व्यथा किसी से कह नहीं पाता और इसके लिए वो चारु को भी दोष नहीं दे पाता है , और अपने आपको सुरा सुंदरा में डुबोता चला जाता है , धीमपुर राज्य का अधिकांश हिस्सा अधीमपुर की सेना की छावनी में तब्दील हो चुका था , अब चाहकर भी चिकोटा अपने स्वयं के राज्य के फैसले नहीं ले पाता है चिकोटा धीमपुर के राजकीय अधिकार क्षेत्र से पूर्णतः बाहर हो चुका था , और वो चाहकर भी कोई भी न्यायालयीन प्रकरण का निर्णय नहीं ले पाता है , पुरुष प्रधान समाज होने की वजह से चारु और वीचारु अपंने बाप की राजनीतिक विफलता नहीं देख पाती है , इसीलिए वो चाहती है धीमपुर की बागडोर अब उन दोनों के हाँथ में आजाये और वो दोनों वीचारु के पुत्र के बड़ा होने का इंतज़ार करने लग जाती है , और तब तक चितरंजन अपने इशारों पर घुमाने का आदी बना देती है , दिन गुजरने लगते हैं , उम्र बढ़ने के कारण चिकोटा और फुवांचू का शरीर ढलने लग जाता है , इसी बात का फायदा उठा कर चारु बाल्यास्था में ही वीचारु के पुत्र को धीमपुर के उत्तराधिकारी मनोनीत कर देती है और उसे गोद में बिठाकर धीमपुर पर शासन करने लग जाती है , अब उसके सामने सबसे बड़ी समस्या थी फुवांचू के सैनिक जिन्होंने अधीमपुर की आधी से ज़्यादा सर ज़मीन पर कब्ज़ा कर रखा था , और इस समस्या का हल चारु अकेली नहीं कर सकती थी चिकोटा शारीरिक और मानसिक रूप से पूर्णतः आसक्त हो चुका था , इसके लिए उसे वीचारु के सहयोग की आवश्यकता थी , अपने सहयोग के लिए चारु वीचारु को धीमपुर में रहने केलिए एक अलग से महल बनवा देती है , और देखभाल के लिए चितरंजन को हिदायत दे दी जाती है की समय समय पर आकर महारानी वीचारु का ध्यान रखे , और साथ ही साथ अपने बूढ़े माँ बाप की सेवा अधीमपुर में जाकर किया करें , बेचारा चितरंजन महारानी के आदेश की अवहेलना कैसे कर सकता है , इधर फुवांचू की सेना से टकराने के लिए चारु और वीचारु रेडकैट सेना तैयार कर लेती है जिसमे नगर भर की तमाम भगेल ,रखैल, प्रोस्टीटूट तंत्रविद्या में पारंगत , जिन्होंने अपने परिवार के किसी न किसी सदश्य , पति, पुत्र ,सास ,बहू, ननद या अन्य किसी अपने सगे सम्बन्धी की बलि देकर तांत्रिक सिद्धियां हासिल की हों , ये औरतें काला जादू वुडू और टोना टोटका करने में पूरी तरह से दक्ष थीं , इनमे कुछ जंगली जनजाति की भी सामाजिक रूप से अपेक्षित महिलायें थी , और चरित्रहीन महिलाओं को हथियार चलाना घुड़सवारी और पुरुषों को हर तरह से अपने मोह जाल में फंसा कर उनका वध करने की ट्रेनिंग दी जाती थी , इधर वीचारु अधीमपुर की महिलाओं को भी धीमपुर की रेडकैट महिलाओं की फ़ौज में शामिल करने का मुहीम चला देती है , मगर उसका ये मुहीम ज़्यादा दिनों तक नहीं चल पाता है और गुप्तचरों के माध्यम से फुवांचू को इस योजना की भनक लग जाती है , और वो चिकोटा को बुला कर उसी के सामने वीचारु को राज्य से बेदखल कर देता है और बेचारा मासूम चितरंजन कुछ नहीं कर पाता है ,

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चारु और वीचारु की रेडकैट गैंग में कुछ ठरकी बुढ़ियों को भी शामिल किया गया था जो की अपनी ठरक मिटाने के लिए अधीमपुर के नवयुवकों को अपने जाल में फँसाती फिर उनका दैहिक आर्थिक शोषण करती और उन्हें इतना मानसिक प्रताड़ित करती की वो या तो पागल हो जाते या फिर आत्महत्या करने पर उतर आते , अगर आत्म हत्या नहीं करते तो अपने परिवार के सदस्यों को मार डालते , इस तरह अन्य युवतियां भी अधीमपुर के नवयुवको और बुजर्गों को अपना टारगेट बनाती और उन्हें अपनी उँगलियों में नचाती , धीरे धीरे अधीमपुर चारु और वीचारु के हुश्न्जाल वाले शीतयुद्ध से भीतर ही भीतर खोखला होता जा रहा था , फुवांचू को अब इस बात का एहसास होने लगा था की धीमपुर उसके हाँथ में आये या न आये मगर अधीमपुर की बनी बनाई सल्तनत ज़रूर उसके हाँथ से चली जाएगी , और दखते देखते आखिरकार हुआ भी वही , चारु और वीचारु की रडकट सेना इतनी मजबूत होती गयी की अधीमपुर की सेना में भी चारु कर वीचारु के चाहने वाले पैदा होने लगे थे , और जब चारु और वीचारु की सेना अधीमपुर की गलियों में अपना आतंक मचाती थी तब अधीमपुर की सेना एक दो मुक़ाबले तक ही उनका सामना कर पाती थी, इसके बाद अधीमपुर की रक्त रंजित मवाद और पस से भरी सादे मांस की बदबू वाली सकरी गलियों में कहीं खो जाती थी , इधर चारु और वीचारु की रेडकैट सेना अधीमपुर के घरों में छुपे बैठे बूढ़े और बच्चों का खुल ए आम का नरसंहार कर रही थी पहले तो सिर्फ ताजे गोस्त की पूर्ती के लिए ही वध कर रही थी जो की धीरे धीरे शौक में तब्दील होता गया , बेबस फुवांचू चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा था , उसके दोनों उत्तराधिकारियों को खो चुका था , चारु और वीचारु की रेडकैट सेना कभी भी फुवांचू के किले में हमला कर सकती थी , और फुवांचू चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता था , राज्य को बचाने के लिए फुवांचू ने अपने मंत्रिमंडल की बैठक बुलवाई मंत्रिमंडल ने चिकोटा को आमंत्रित करने का प्रस्ताव रखा चिकोटा को मंत्रणा के लिए बुलाया गया ,

फुवांचू ने चिकोटा के आवभगत में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रखी थी , चिकोटा के सभा में प्रवेश करते ही फुवांचू सीधा

चिकोटा के चरणों में शास्टांग दंडवत गिर जाता है , और कहता है त्राहिमाम महामहिम मुझे अगर कोई भूल चूक हो गयी हो तो क्षमा करें , अगर लेनी देनी में कोई कमी रह गयी हो तो मैं अपना सब कुछ आपके चरणों में न्योछावर करने के लिए तैयार हूँ , आखिर हम एक दूसरे के पडोसी हैं , और आप हमारे समधी भी हैं , चिकोटा मुस्कुराता हुआ फुवांचू से कहता है अब बहुत देर हो चुकी है समधी जी हमने आपके पुत्र को तो पहले ही अपने राज्य का उत्तराधिकारी बनाने की मनसा मन में ले रखी थी लेकिन आपने लालच के चलते हमारे राज्य को अलग ही तरीके से हथियाने का प्लान बना डाला अब , मेरे हाँथ में कुछ नहीं है अब आपका और आपके राज्य का भविष्य आपकी दोनों बहुओं चारु और वीचारु के हाँथ में हैं , तभी लड़खड़ाता हुआ चितरंजन सभा में आ पहुँचता है , उसकी तरफ देखते हुए चिकोटा हँसता हुआ कहता है आ गए आपके राज्य के भावी उत्तराधिकारी खुद के कदमों को सम्हाला नहीं जा रहा है अब ये सम्हालेंगे आपके राज्य को , फुवांचू चितरंजन के मुँह में थूक देता है और कहता है धिक्कार है ऐसे पुत्र पर जो अपने पुत्र धर्म का पालन न कर सके , लड़खड़ाता हुआ चितरंजन कहता है पिता जी मुझे माफ़ कर दीजिये और वीचारु मेरी जान चिल्लाता हुआ वहीँ धड़ाम से गिर जाता है , तभी चारु और वीचारु की रेडकैट सेना अधीमपुर के सैनिकों को रौंदती हुयी फुवांचू के महल में प्रवेश कर जाती है , और एक ही झटके में फुवांचू को सिंहासन से खींच की कर फर्श पर फेंक दिया जाता है , तथा दूसरे ही पल फुवांचू और उसका लाचार बेटा चितरंजन बेड़ियों से जकड़े चारु और वीचारु के सामने असहाय खड़े दया की भीख मांगते नज़र आते हैं , उन्हें उन्ही के महल में नज़र बंद कर दिया जाता है , और तमाम उम्र वो महल में ही बंदी की तरह जीवन व्यतीत करते हैं , खाने के लिए उन्हें बावर्ची खाने में बचे कुछ सड़े गले मांस के टुकड़े और बासी रोटियां दी जाती है , ताकि वो ज़िंदा दिखाई देते रहें , बस मरे नहीं , कहते हैं चारु की प्रेमविमुखता के बाद त्रिजुआकैट के जंगलों में पागल साधु के वेश में भटकते हुए रंजन को आज भी देखा जा सकता है ।

story continue……….

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