दीदा ए यार की ख़ातिर,

0
148
दीदा ए यार की ख़ातिर,
दीदा ए यार की ख़ातिर,

दीदा ए यार की ख़ातिर,

दीदा ए यार की ख़ातिर फ़लक के चाँद तारों में डूबे रहना ,

ज़मीनी समंदर की गहराइयाँ क्या कम थी इश्क़ में गोतों के लिए

 

शायरों की महफ़िल में चाँद तारों की बात होती है ,

ख्यालों में मेहबूब सजते हैं फ़लक पर शब् ए बारात होती है ।

 

डूब कर मरते तो इश्क़ की गहराइयों का पता चलता ,

फलक के चाँद तारों को जान ए जोखिम क्या कम है ।

 

तेरे फ़लक पर दो दो आफताब होंगे ,

यहां एक चाँद सीधा सादा सम्हाला नहीं जाता ।

 

फ़लक पर जलवा सजा के रखे हैं ,

सुबह सुबह सर्द की ठिठुरन से यहां रजाई के बाहर मुह निकाला नहीं जाता ।

 

 

शाम ढलते ही तेरा शर्माना ,

फ़िज़ा की मौजों से बगावत सा लगता है ।

 

सुबह को नूरानी चेहरे की दमकती लाली ,

रात चाँद तारों के दामन में गुल खिला होगा

 

शब् ए फ़ुर्क़त की तन्हाई वो दर्द भरे नगमे ,

ये सोने नहीं देती वो रोने नहीं देते ।

 

गीले गीले ख़्वाबों को सुखाने की ज़िद ,

हाँथों हाँथों में सारी रात फिसल जाती है

 

सर्द रातों में झुलसती यादें , गीले तकिये को जला देती हैं

 

 

तेरी बर्क़ सी बातें हाल ए दिल रेज़ा रेज़ा ,

तेरी नज़रों से छलक जाता है अंदाज़ ए लहज़ा तेरा ।

 

हिज्र ए तन्हाइयों में कितना जला होगा भीतर तक ,

बर्क़ से आदम ए बू तक नहीं आती

 

नाज़ुक ख़्याली में सारे ज़माने नैमतें क्या कम थीं ,

जो अपनी मोहब्बत का भी बर्क़ मुझको ही उढा डाला ।

 

ज़र्रे ज़र्रे को मोहब्बत करके जहान को बर्क़ करता ,

जो मैं ज़िंदा होता ज़माने में आब ओ हवा की हिफाज़त करता

 

बर्क़ बदलें तो क्या तहरीरें बदल जाएंगी ,

हर्फ़ दर हर्फ़ अब भी मोहब्बत ही लिखा रहता है ।

 

http://www.pushpendradwivedi.com/%e0%a4%ac%e0%a4%b0%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%a6%e0%a5%80-%e0%a4%8f-%e0%a4%9c%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%a8-%e0%a4%ae%e0%a4%a8%e0%a4%be%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b6%e0%a5%8c/

 

गुलपोश नगीने में छुपे एक गुल की झलक ,

राज़ ए दिल बर्क़ से बाहर भी निकलते होंगे ।

pix taken by google