क़ैद ए बामुशक़्क़त में गुलों की जान गयी ,

0
96
क़ैद ए बामुशक़्क़त में गुलों की जान गयी ,
क़ैद ए बामुशक़्क़त में गुलों की जान गयी ,

क़ैद ए बामुशक़्क़त में गुलों की जान गयी ,

क़ैद ए बामुशक़्क़त में गुलों की जान गयी ,

गोया सेज़ ए सहादतो पर इल्ज़ाम लग गया ।

हाँथ जला डाला एक दिया जलाने में ,

क्या सारा जहां जला डालोगे दिल बुझाने में ।

अदावत ए इश्क़ की गिरफ़्त में जब शिकार मिले ,

कुछ दिल ए नाचीज़ बेमुरव्वत कुछ गुनहगार मिले ।

खिजां खिजां है ज़मीन फलक धुआँ सा है,

सज़र से टूटते पत्ते दिल रुआंसा है ।

कुछ इस अदा से क़त्ल करते हैं ,

उफ़ तक होती नहीं नज़रों से सरे राह यूँ दिल कलम होते हैं ।

 

चाक दामन में इत्तेफ़ाक़ पाल रखे हैं ,

अदा ए हुश्न से आशिक़ों का लख़्त ए जिगर सम्हाल रखे हैं ।

बेमुरव्वत में फँस गया होगा ,

किसी का नूर ए नज़र किसी का अदावत ए इश्क़ बन गया होगा ।

ऐ हसीं दुनिया के डूबते सफ़ीने ,

माझी कहाँ कश्ती कहाँ पतवार कहाँ है ।

कागज़ी दुनिया के बेताज़ बादशाह ,

तेरी सोहरत कहीं दौलत कहीं तू बर्बाद कहीं और खड़ा है ।

शराब गर बुरी चीज़ होती ग़ालिब ,

जा पूछ मैकदों ने खुद कितने ग़ालिब ए सुखन तैयार किये हैं ।

 

तूने देखी नहीं है ज़ौक़ ए शायरी अपनी ,

हवा के रुख पे मौजें लफ्ज़ दर लफ्ज़ झड़ती है ।

दिल ए नादाँ की गुज़ारिश पर दुआ क़बूल हुयी ,

हवा चली रुख़ से नक़ाब हटा क़यामत की रात से पहले क़यामत की बात टली ।

रात सरगोशियों से हटा रही नक़ाब आहिस्ता ,

जितना बच गया हुश्न के सरारों से इश्क़ ए माहताब बावस्ता

हो सकता है कल फिर शाम ए बज़्म में पर्दा उठे ,

महफ़िल में कहीं तुम ही नहीं कहीं हम ही नहीं हो ।

शहरी आदमख़ोरों को गोश्त की तलाश है ,

चाक दामन में जिस्म वहशी नज़रों से मासूम छुपाएँ कैसे ।

http://www.pushpendradwivedi.com/%e0%a4%a8%e0%a4%b6%e0%a5%8d%e0%a4%a4%e0%a4%b0-%e0%a4%9a%e0%a5%81%e0%a4%ad%e0%a5%8b-%e0%a4%b0%e0%a4%b9%e0%a5%80-%e0%a4%b9%e0%a5%88/

 

बड़े बेख़ौफ़ क़त्ल होते हैं अब भीड़ भाड़ में ,

क़ातिल साफ़ बच के निकल जाते हैं नक़ाब की आड़ में ।

हिज़ाब भी ज़रूरी है नक़ाब भी ज़रूरी है ,

मनचलों के शहर में खानाख़राबी भी ज़रूरी है ।

pix taken by google