ग़म ए गर्दिश में जली हैं बहुत,

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ग़म ए गर्दिश में जली हैं बहुत,
ग़म ए गर्दिश में जली हैं बहुत,

ग़म ए गर्दिश में जली हैं बहुत,

ग़म ए गर्दिश में जली हैं बहुत हिज़्र की रातें ,  अब ठण्ड की बाहों में जश्न ए सेहरा होगा ।

सोच कर ज़ीनत ए जहाँ की बातें अर्से गुज़रे , अब तो मुफलिस ए वक़्त में भी लुत्फ़ आता है ।

तूने मौसमों से सीख रखे हैं मिजाज़ ए हुश्न की सोहरत , और हम ठण्ड के मौसम में भी दिल जला के रखते हैं ।

घरों से झाँकते चेहरों में हमने खौफ देखा है , बेटी किसी की भी हो घर की इज़्ज़त ही होती है ।

इतना भी लहू ठहरा नहीं मौसमी ठण्ड के आगे , जिस्म की धड़कती धड़कनों में तेरा लम्स बहता है ।

वक़्त की दीवार पर ग़मों के दर्द की सीलन  , इस कड़कड़ाती ठण्ड में दिल और ज़ख्म कैसे बर्दाश्त करेगा ।

कितना सुकून था घरों से झाँकते चेहरों पर , फिर किसी आदम ए खौफ़ ने बेघर बार किया होगा ।

कभी आशिक़ों के शहर में भी धूम होती है , सारा शहर जश्न मनाता है इश्क़ की बर्बादियों के बाद ।

लुत्फ़ आता है एक कुनबे में , जिसे हम अनेकता में एकता का हिन्दुस्तान कहते हैं ।

बचपन की मोहब्बत गुड्डे गुड़ियों का खेल था , अब हर रोज़ शेरवानी सरक जाती है हर एक दरख़्वास्त के बाद ।

लुत्फ़ आता है तमाशा का नक़ाब हटने पर , गर तमाशाई ही बने तमाशा तो फिर कौन हँसे किस पर ।

गुमनामी के डर से मर गया शायद , तहरीर ए वक़्त में आदमी का अच्छा खासा रुतबा था ।

उतर रहे हैं रोज़ ज़मीन पर फ़रिश्ते कितने , कोई मेरे मेहबूब के जैसा भी ख़ुदा हो किसी में बात नहीं ।

तू किसी ग़ैर का हो लाख सही , दिल ए फ़ानी कब रश्म ओ रिवाज़ की परवाह किया करता है ।

तेरी गलियों की शिनाख्त पर ये मुद्दा आया , कुछ तो मलबों में दबे दिल थे कुछ तेरे नाम से अब भी धड़क रहे थे ।

रात भर सोती नहीं हैं नज़रें , ख़्वाबों ख्यालों में बस बेज़ुबानों का शिकार किया करती हैं ।

ये दिल भी बड़ा फितूरी है , इश्क़ उससे ही करता है जो सीधा दिल पे वार करता है ।

ज़माने भर की नैमतें लाख सही , दिल को तेरी जुस्तजू ए फIनी का फितूर आज भी है ।