जो निकल पड़े हैं रगों में रंजिश ए जूनून लेकर,

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जो निकल पड़े हैं रगों में रंजिश ए जूनून लेकर,
जो निकल पड़े हैं रगों में रंजिश ए जूनून लेकर,

जो निकल पड़े हैं रगों में रंजिश ए जूनून लेकर,

जो निकल पड़े हैं रगों में रंजिश ए जूनून लेकर , जाने किस खुल्द में सोएँगे दिलों का सुकून लेकर ।

शहर भर में सियासी जानवर पजाए हैं , मुर्दों के बीच में मुर्दों के लिए रंजिश फैलाए हैं ।

सावन तो जल मरI था किसी बिरहन की आग में, बIदल है मांघ पूस ज़रा जमके बरस ले I

शहर भर में वास्ता कोई नहीं रखता , आज कल मतलब परस्ती से सारे लोग मिलते हैं ।

शहर भर में कैसी लगी है आग , आसमान सुबह शाम रात रोये पड़ा है ।

ज़मीन पर अब्र ए रानाई , सारा नज़ारा खुल्द का सा है ।

मोहब्ब्बत ग़र काम है ज़रूरी पारिश्रमिक भी हो , दिल दिमाग तक खरच जाता है आशिक़ी की राह में I

जो समझ में आये समझ लीजिए , इश्क़ का मुब्तला ही कर लीजिए

रंजिशें दिल में हो ग़र बातों में वक़्त ज़ाया न करो , उम्रें गुज़र जाती है जज़्बातों का तगादा करते ।

दोस्तों से वफ़ा की क्या उम्मीद करें , यहां तो दुश्मन भी रंजिशें निभा न सके ।

जबीन ए आदम से दम ख़म की बात न कर , कब्रों में दबे मुर्दों से लोग अपनी रंजिश निकाल लेते हैं ।

इश्क़ हो तो थोड़ा दर्द हो तल्खियाँ हो थोड़ा रंजिशें हो, मोहब्बत ही मोहब्बत न हो वरना ज़मीन ज़मीन नहीं लगती खुल्द हो जाती है ।

नश्लें ही नहीं क़ौमे तबाह करती हैं ,ये आतिश ए रंजिश पहले अपना घर तबाह करती है ।

दिलों में रंजिश तो है तर्क़ ओ ताल्लुक़ नहीं न सही , दुश्मन ए यार को दोस्ती ही सही लाख अच्छी सही ।

रंज ओ ग़म लाख सही क़ातिल को , रंजिशें तिल भर भी नहीं क़ातिल को ।

पल भर में जो अपने थे पराये लगने लगे , इक नज़र की खलिश और हमारा ज़माना बदल गया

कहा सुनी दिल की दिल तक होती तो जायज़ थी , बेजा में नज़रें भी रंजिशें भजाने निकल पड़ी

हद से ज़्यादा तेरे वादों पर ऐतबार किया था , खुद से ज़्यादा तेरी रंजिश का इख़्तियार किया था