कभी दिल पर कभी जिगर पर वार करते हैं,

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कभी दिल पर कभी जिगर पर वार करते हैं,
कभी दिल पर कभी जिगर पर वार करते हैं,

कभी दिल पर कभी जिगर पर वार करते हैं,

कभी दिल पर कभी जिगर पर वार करते हैं , तोरे नैना एक बार में दो दो शिकार करते हैं ।

यहाँ ज़ख्मों की कहानियाँ कुछ और हैं , वहाँ दिल ए नादाँ की परतें उधेड़ी जाती हैं ।

क़िरदार को गैरत मंदी का रास्ता देकर , वो सरे राह मुड़ गया ज़माने में लोगों का वास्ता देकर ।

जलाओ न दिल ए खादिम को रह रह कर , बेखुदी में इश्क़ ए हाज़िर जवाबी का मुब्तला किये बग़ैर ।

आज फिर शाम से दिल बुझा बुझा सा है , गोया तू ख्यालों में मेरे अब भी ज़िंदा है ।

कभी दो नज़रों की गुमनामी में ठहरो , गोया खो न जाओ तो कहना मोहब्बत मुमकिन ही नहीं थी ।

दरमियान जो भी था लेता जाता , दाग़ अच्छे हैं सोच कर इश्क़ के साज़ ओ सामान से मैं कब तलक यूँ ही दिल बहलाऊँगा।

जलता सरारा है मोहब्बत मेरी , दरमियान इश्क़ की हवाओं को मौजों की रवानी न दो ।

दो चार छौंके हो तुनक मिजाज़ी के , दरमियान रिश्तों के लज़ीज़ियत ही बढ़ा देते हैं ।

दो नज़रों की जुगल बंदी फलसफ़े हज़ार , गुबार ए इश्क़ के दरमियान दिलों की फ़िज़ा रंगीन कर गयी ।

वो कहते हैं दूरियां ए दरमियान हमें नींद ही नहीं आती , बग़ैर उनके हम सारी रात सोये हो जैसे ।

दरमियानी रात के दायरे में जो रूहों का साया है , करें किससे गिला शिकवा यहाँ कौन अपना पराया है ।

क़तरा क़तरा भिगोने में भर दे मेरा , मादर ए वतन का ज़र्रा ज़र्रा मेरे लहू से तर कर दे ।

जान छुड़ाने की भी मोहलत न मिली तब से , गोया इश्क़ ए मुक़दमा संगीनी में तामीर हुआ ।

अगर वो रात के हालातों का मुआइना करता , दो चार सिलवटें मेरे हिस्से की भी निकलती उसमे ।

ओहदे ज़मीनी ज़र्रों के बढ़ चढ़ के बोलते , जो खड्डे हैं दिलों को अभी भरे तो नहीं है ।